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संदेश

कल

कोई आकृति नहीं , परछाइयाँ फिर क्यों हैं ? लगाव तो तनिक भर का नहीं , पर होता अलगाव नहीं क्यों है ? गलत हैं , फिर सही क्यों हैं ? जहां सालों पहले थे , अब भी वहीं क्यों हैं ? मूर्त ना हो तो ना सही , जख्म अब भी देते क्यों हैं ? न लिखित हैं , न उकेरे हुये , छाप इनकी अमिट क्यों है ? चैन से न दिन कटने देते हैं , रातों की नींद उड़ा देते क्यों हैं ? कहने को तो कुछ शब्द भर हैं , हर रोज , हर पल चुभते क्यों हैं ? नहीं मायने रखते हैं अब वह चेहरे , फिर उनके शब्दों की चुभन क्यों है ? शब्द यह अपने नहीं पराए ठहरे , तो इनके दर्द का सहन क्यों है ? आशय क्या है इन शब्दों के अब भी होने का ? कारण क्या है इन बेगाने उवाचों को अब भी सजोने का ? एक उम्र सी गुजर दी है तबसे , उन शब्दों का घाव अब भर क्यों नहीं जाता ? कैलेंडर पर कैलेंडर पलटता रहा हूँ वक़्त को , जो बीत गया है वह गुजर क्यों नहीं जाता ? जो बीत गया है वह गुजर क्यों नहीं जाता ?

अरण्य मेरी यादों का

अंधेरा बहुत है , फिर भी जगह जगह दीप जलते हैं , धुंध भी है , नमी भी है सब सजोया हुआ है.... पर कोई कमी सी है भरा हुआ है , भीड़ है , फिर भी खाली हैं , सजीव भी हैं , निर्जीव भी , रंगीन हैं , फिर काली हैं , हर रोज कुछ जा जुड़ती हैं दूर जाती हैं फिर मुड़ती हैं , कुछ गुमसुम , कुछ चित्कारती कुछ सोई -2 कुछ खोई-2 किसी ने कोई चेहरा उकेरा है , कुछ अपनी जगह नहीं बना पाईं , कुछ दबंग हैं , जिन्होनें अपनी कद से से ज्यादा जगह घेरा है। कुछ शक्ल , कुछ बेशक्ल एक तरफ अमावस , दूसरी ओर पूनम का बसेरा है। एक महल है , कई कमरे हैं , कहीं रंगीन शामें बिखरी हैं , कहीं छुपा कोई धुंधला सवेरा है। कुछ सुखी , कुछ रूखी कुछ सुर्ख , कुछ ज़र्द कुछ रेत की , कुछ पत्थर सी , कुछ खंडहर , कुछ इमारत , आड़े-टेढ़े अक्षरों से उकेरी इबारत , आसमान में ताने कुछ सीना , झुलसाती धूप में बहाती कुछ पसीना , कोई हल्की , कोई भारी , मूर्त-अमूर्त , कुछ हरे , कुछ ठूंठ , कहीं सच है , कहीं झूठ , कोई मुसकुराती , हँसती , रुलाती , धूप सी , छांव सी , सर्...

गणित

बहुत शातिर है , चाल बड़ी तेज़ है उसकी.... कितनी भी कोशिश कर लूँ.... उसके कदमों से कदम नहीं मिला पता हूँ... वह आगे निकाल जाता है , छोड़ के सब कुछ पीछे... लिखावट महीन है उसकी... सबके समझ में नहीं आती.... गणित बहुत अच्छा है , कुछ भी नहीं भूलता , सब याद रखता है , हर साल मेरे कर्मों का हिसाब मेरे चेहरे पर दर्ज़ कर , गुजर जाता है ‘ वक़्त ’ ! 

मर्द

थोड़ी लज्जित हैं यह आँखें , कुछ बोझ सा होता है पलकों पर! झुकी-2 सी , दबी -2 सी रहती हैं , बोझिल पलकें मेरी! नज़रें नहीं मिला पता हूँ किसी महिला की नज़रों से..... दिल में चोर सा बैठा है एक ‘ मर्द ’ जो शर्मिंदा है.... लज्जित है.... अपने मर्द होने पर!!!!!!!

लहरें...

“अगर लहरों ने तुम्हारा क़िला गिरा दिया तो ? “अरे , नहीं गिराएंगी... उनसे permission जो ली है मैंने..... जब तक मैं यहाँ हूँ तब तक यह क़िला मेरा है....” “और उसके बाद... ??? “ वैसे सब तो इनका ही है..... मेरे जाने के बाद इनकी मर्जी.... चाहे इस क़िले में आ बसें ... या अपने साथ बहा ले जाएँ .... मुझे क्या..." मैं बस मुसकुराता हूँ .......  “ ओ हैलो... तुम हंस क्यों रहे हो.... मैं मज़ाक नहीं कर रही.... मैं तो इनसे बातें भी करती हूँ..... यह मेरी बातें समझती हैं और मैं इनकी ... simple है..." “ हूँ... अच्छा तो जरा हमें भी बताओ क्या क्या बातें की तुमने इनसे....." “रहने दो तुम्हारे बस का रोग नहीं इन्हे समझना..... वैसे एक बात बताऊँ..... बड़ी भोली हैं यह... कहती है... पास आओ थोड़ा प्यार दो.... तुम्हारे पैरों में आ पड़ूँगी.... पाँव चूम लूँगी तुम्हारे.... पर यह प्यार सबके लिए नहीं है... उनके लिए तो बिलकुल ही नहीं , जो अपने आप में खोये हुये हैं.... पड़े हुये हैं एक दूसरे की बाहों में..... selfish people…… सागर किनारे आ के भी लहरों के लिए वक़्त नहीं इनके पास....” बड़...

बूढ़ा बस स्टैंड

लड़ाई हुई थी अपनी आँखों की , पहली मुलाक़ात पर , वह बूढ़ा सा बस स्टैंड , मुस्कुराया था देख हमें , जाने कितनी बार मिले थे हम वहाँ , जाने कितने मिले होंगे वहाँ हम जैसे , वह शब्दों की पहली जिरह , या अपने लबों की पहली लड़ाई , सब देखा था उसने , सब सुना था , चुपचाप , खामोशी से , बोला कुछ नहीं। कहा नहीं किसी से , कभी नहीं। कितनी बार तुम्हारे इंतज़ार में , बैठा घंटों , जब तुमने आते-2 देर कर दी। जब कभी नाराज़ हो मुझे छोड़ चली गयी तुम , कई पहर , उंगली थामे उसकी , गोद में बैठा रहा उसके। उसके कंधे पर सर रख के। याद है वहीं कहीं गुमा दिया था तुमने दिल मेरा , हंसा था मेरी बेबसी पर वह , अब वह बूढ़ा स्टैंड वहाँ नहीं रहता , कोई fly over गुजरता है वहाँ से देखा था, जब आया था तुम्हारे शहर पिछली बार। कहीं चला गया होगा वह जगह छोड़ , उस बदलाव के उस दौर में , जब सब बदले थे , मैं , तुम और हमारी दुनियाँ ! अब जो सलामत है वह बस यादें हैं , और कुछ मुट्ठी गुजरा हुआ कल , याद आता है वह दिन, जब तुम्हारा दिल रखने को तुम्हारे नए जूतों की त...

काला दिल

सुबह सबेरे चिपका होता है आसमां से यूं , ज्यो सोते वक़्त , माथे की वह बड़ी सी लाल बिंदी , आईने से चिपका देती थी , दादी माँ , बढ़ता , घटता , बढ़ता है , मिटता है और आ जाता है , रंग बदलता रहता है , सुबह , दोपहर , शाम , क्यो ? जलता-2 रहता है , पर जलता है क्यो तू ? आसमां में मीलों दूर बैठा , जलन किस बात की है तुझे ? गुबार किस बात का है तेरे दिल में ? क्या धरती ने दिल तोड़ा था तेरा ? या हमसे जलता है तू ? धनक तेरी देख , सोचता हूँ मैं , हर वक़्त जलते रहने वाले सूरज , दिल तेरा कितना काला होगा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!