Friday, December 31, 2010

साल का आखिर सच...

स्याह रात ने अपने पर फैला दिए थे .... साये गहरे होते जा रहे थे.... वो तड़प रहा था... सितारों ने बेड़ियों से जकड़ लिया था उसे....... आवारा उल्कायों ने पहले उसे दोस्ती के जाल  में फसाया और फिर जाते जाते उसे दाग दे कर चली गयीं ... अनगिनत दाग...उसके चहरे पर वो धब्बे साफ साफ नज़र आ रहे थे.... आवारा उल्काओं से उसकी दोस्ती धरती को पसंद नहीं आई थी शायद ... अब धरती की परछाई 'चाँद' को निगल रही थी... उसका अस्तित्व ख़त्म हो रहा था.... चांदनी का भी दम घुटा सा जा रहा होगा ... तभी तो उसकी रंगत पिली पड़ती जा रही थी.. चाँद की हमदर्द चांदनी ने भी शायद उससे दूर जाने का फैसला कर लिया था.... निसहाय सा चाँद उसे बस जाते हुए देख रहा था.... वो अपना हाँथ बढ़ा चांदनी की कलाई थाम लेना चाहता था..... पर उसके हाँथ तो उठे ही नहीं.... गुनाहों के बोझ तले दबे जो थे.... और बेरहम चांदनी? उसने तो पलट कर देखना भी गवारा न समझा...... चाँद की आँखे भर आई... उसकी आँखों से खून टपक रहा था...टप- टप... टप.. कर खून का हर एक कतरा मेरे लिहाफ को भिगोता रहा.... छत पर खड़ा मैं चाँद की इस दुर्गति का मूक दर्शक भर था..... चाँद की लौ फडफडा रही थी... शायद बुझने से पहले उसकी  आखिरी कोशिश होगी ... दम घुटने सा लगा .. हांफने की आवाज़ कानों में गूंज रही थी.. माथे पर हाथ फेरा तो हाथ चिपक कर रह गया.....चीखना चाहता था पर गले आवाज़ नहीं निकल रही थी....
हाँथ बढ़ा चांदनी को पकड़ लेना चाहता था.. बतलाना चाहता था , चाँद के लिए उसके मायने.... पर मेरे भी हाथ आगे नहीं बढ़ रहे थे.. वो तो हिलने तक को तैयार न थे.... मेरा हल भी चाँद जैसा ही था कुछ...एक झटके से मेरी ऑंखें खुल गयीं.. घबरा कर चारो तरफ देखा तो पाया अँधेरा ही अँधेरा था... दौड़ते हुए बालकनी में पहुंचा..... चाँद एक झुरमुट के पीछे छुपा मुस्कुरा रहा था... सपना देखा था मैंने.. अपने होश संभालते ही मैंने राहत की साँस ली.. 
मैं चाँद की आँखों में आँखें डाली.. उसने मेरी आँखों में झाँका... मैं मुस्कुराया और वो हंसा.... बोला मुझसे चाँद मेरा... पगले जलना बुझाना तो मेरी नियति है.... इससे डर कैसा....न धरती मुझे बुझा-बुझा कर थकती है और न मैं जलते जलते.... अँधेरे में तो सूरज भी रास्ता भटक जाता है.. मैं तो चाँद हूँ.. मेरे पास अपनी रोशनी कहाँ...? ना जाने कौन किसकी बेबसी पर हस रहा था, पर दोनों के चहरे पर एक मुस्कराहट जरुर थी ....और दोनों ही के आँखों में नींद का कोई अता-पता नहीं था..
नज़रें घुमाई तो देखा 'भोर का तारा' हम दोनों को देख मुस्कुरा रहा था.... अरे शाम ही को तो उसने संध्या के आगमन की सूचना दी थी और अब ? रैना की विदाई की तयारी में है? वक़्त कितनी जल्दी बदल जाता है न.... 
एक बार फिर चाँद को देखा... चाँद मुस्कुराया और बोला... तुझे क्या पता कब तेरी ज़िन्दगी में संध्या का कोई सितारा, भोर का तारा बन बैठे....मैं मुस्कुराया... टिक टिक की आवजा मुझे कमरे में बुला रही थी..  कमरे में आ, घडी की आँखों में झाँका तो पाया कि पांच बजने को हैं......आज इस साल का आखिरी दिन है... सोच ही रहा था कि एक ख्याल आया... आखिर 'new year resolution ' भी तो चीज है.... सोचंते लगा.... चाँद अब भी खिसकी से झांक रहा था.. उसे देखा और मैं मुस्कुराया ... मुझे एक नया new year resolution जो मिल गया था.... 
अबकी बार मुझे चाँद बनाना है..... कोई लाख बुझा बुझा के थक जाये ... मेरी लौ जलनी चाहिए... चाँद की  तरह..... हमेशा..... 

Saturday, December 18, 2010

चेहरे



वो आइना अपना सा लगता था मुझे,
आखिर उसी में तो एक चेहरा दिखता था
जो जनता था मुझे,
पहचानता था मुझे...
एक रोज हवा का एक झोका 
उसकी बुनियाद हिला गया,
उसके अस्तित्व, उसके 
अरमानो को मिटा गया.
कराहता मिला था फर्श पर मुझे,
उठाया, देखा, और पाया,
कितना झूठा था मेरा आइना
ता-उम्र मुझे एक झूठा चेहरा दिखाता रहा,
मेरी वास्तविकता मुझसे ही छुपाता रहा,
उसके को सच मन मैं बरसों इतराता रहा..
पर जाते-२ वो मुझे मेरी हकीक़त बता गया,
मुझे मेरे अनगिनत चेहरा दिखा गया,
चेहरे पर पहने थे कई चेहरे मैंने
वो सब  से रु-ब-रु करा गया...
वो टूट गया,
अपना सा लगाने वाला 
वो चेहरा मुझसे रूठ गया..
फिर आइने का सामना कम ही कर पता था,
दिखाता था जिधर उधर जाने से कतराता था,
खुद से नज़ारे मिलाने में ये शर्म कैसी?
और क्यों?
क्या मैंने गुनाह किया है?
क्या मैंने सिर्फ झूठ को जिया है?
नहीं,, तो फिर दर्पण से ये डर कैसा?
सोच यह, कर हौसला बरसों बाद.
आँखों के सामने से गुजरे 
अपने ही चेहरे को कर के याद..
आज आइने से टकरा गया
अपने नए नवेले अनोखे चेहरे 
को देख घबरा गया..
खुछ खो सा गया था चेहरे से मेरे
अपने ही चेहरे में एक कमी सी दिखी
आँखों में हताश से खुछ सपने थे,पर थी
 लबों पर एक मुस्कान की रेखा खिची 
अपनी ही मुस्कराहट इतनी अजनबी  कैसे?
सालों से हूँ अनजान अपनी ही हसी से जैसे...
दिमाग की पहचान तो मुखौटो से बहुत पुरानी है,
मगर दिल के लिए ये तस्वीरे अब तक अनजानी हैं,
माँ के सामने का एक चेहरा
लोगों को दिखाने का चेहरा
एक सुबह का
एक शाम का
कभी तन्हाई वाला 
कभी रुसवाई वाला 
और न जाने कितने चेहरे हैं मेरे
भूल सा गया हूँ अपनी पुरानी छवि को
इन सभी चेहरों में असली कौन नकली कौन?
मैं नहीं जनता...
मेरा दिल इन चेहरों में से किसी भी चेहरे को
अपना नहीं मानता है...

Thursday, December 2, 2010

असुर



सौहार्द, अहलाद,
आनंद परित्यक्त 
देवत्व की राह चुनी 
त्याग पुरुषत्व 

भावनाओं के खँडहर पर 
खड़ा, लाचार बेबस 
मानव हो देवत्व की राह क्यों?
जिस पथ पर तू चल नहीं सकता 
उस पथ की चाह क्यों?

पथिक तू क्यों है
निर्बल, एकाकी, अधीर?
काँटों का ताज तुने ही चुना..
क्यों घबराता है तम से अब 
भ्रम का मकडजाल तुने ही बुना..

लक्ष्य से विचलित, विमुख मानव 
तू जीवन के ज्वलंत ज्वार में खो गया है,
ज़िन्दगी की ताल से खो कर सुर
अब तू न मानव रहा,न देव है
तू एक असुर हो गया है..... 

Tuesday, November 30, 2010

चाय गिरा एक पन्ना...



ऑफिस में बैठे बैठे कुछ वक़्त मिल गया... या यूँ कहूँ तो मैंने कुछ वक़्त चुरा लिया...कुछ लिखने की सोची.... घन्टों लम्बी मत्थापच्ची .. भीर कुछ नहीं समझ आया... लगा लेखनी पर धूल जम आई है.. देखा तो पाया धूल तो मेरी टेबल पर भी जम गई थी..कम ही पलट कर देखता हूँ ना पलट कर टेबल पर बिखरे पन्नों को... लोग भी कहते हैं रहने दो.. इसे देख writer वाली feel आती है... तो ऐसे ही छोड़ देता हूँ.. ज़िन्दगी की तरह पन्ने ही  बिखरे हों तो कागज़ के पन्नो के बिखरने से फर्क ही क्या पड़ता है.... पर आज का दिन कुछ और ही था... आज धूल को जाना ही था.... एक-२ कर ... परत-दर-परत धूल हटता गया... टेबल पर बिखरे स्क्रिप्ट्स के बिच एक पन्ना हाथ लग गया...देख चेहरे पर मुस्कान बिखर गई.... सफाई छोड़... पन्ने की खूबसूरती में खो गया...
 चाय गिरी थी ना तुमने उस दिन... टेबल पर... शायद ये भी उस सुनामी की चपेट में आ गया होगा... याद हैं ना उस रोज वो कांच का कप कैसे तुम्हारे हाथों में आते ही कैसे अस्तित्व हीन हो बैठा .. मेरी ही तरह... और.......
 वो पन्ना बड़ा ही खुबसूरत लगा ..Biased हूँ ना...... शायद obsession है .... तुम्हारी हर चीज ही खुबसूरत जो लगाती है मुझे... आदत जो हो गई है तुम्हारी..... पन्ने पर छलक आई चाय अपने होने का निशाँ छोड़ गई है.... कभी तुम्हारी हथेली पर लिखना अच्छा लगता था ... आज तुम्हारे पन्ने पर लिखने बैठा हूं...यूँ ही... निरर्थक ...
 वैसे आज मेरे स्वीट नवम्बर का आखिरी दिन है....शायद ये आखिरी नवम्बर भी हो तुम्हारे साथ ...... अगला नवम्बर आयेगा इसमे तो कोई दो राय नहीं .... तुम्हारी भी ज़िन्दगी में.... मेरी भी ज़िन्दगी में..... पर तब तक इसके मायने अलग ही होंगे .... दोनों के लिए..... बिलकुल अलग.... आखिर अब हमारे रस्ते जो जुदा ठहरे.... मैं जनता हूँ मैं अगले नवम्बर में कहाँ होऊंगा ... पर तुमवो तो अभी तुम्हे भी नहीं पता....पर यह बात लिखते लिखते मैं एक स्टार बना रहा हूँ... तुम्हारी तरह... जो तुम अपनी हर बात पूरी कर कहते थे Terms & Conditions...
 नवम्बर तुम्हारी भाषा में 'My Fruitful November' अब बस कुछ ही घंटों का ही मेहमान है... पलट कर कितना भी देख लूँ .. लौट कर नहीं आयेगा...शायद तुम्हारी तरह.... तुम्हारा कहना गलत नहीं है... नवम्बर Fruitful  तो हमेशा ही रहा है मेरे लिए... इस बार मुझे खाली हाँथ छोड़ कैसे जाता.... इस बार मुझे जितना दे कर जा रहा है उतना तो कभी नहीं दिया...शायद उम्मीद से बहुत ज्यादा.... ...कुछ पा कर तो सभी खुश होते हैं...आज हम दोनों ही खुश है ना....  तुम कुछ पा कर बहुत खुश हो... और मैं... हूँ ना.. कुछ गवां  पहली बार ख़ुशी मिली है.... एक अभूतपूर्व आनंद.... नवम्बर की यह आखिरी शाम एक मुस्कराहट भेट कर जाना चाहती थी..... सो दिया भी ....
अब मुझे अगले नवम्बर का इन्तिज़ार है... शायद तुम्हे भी हो..... कम से कम ये तो जरुर जानना चाहोगे ना कि अगला नवम्बर क्या सौगात लायेगा मेरे लिए...वैसे तुमसे बिना पूछे .. एक टूटी, बंद पड़ी घडी.. जिसके बंद होते ही मेरे लिए वक़्त वही ठहर गया था ..और तुम आगे निकल गए थे.. बहुत आगे.. मेरी पहुँच से दूर...., एक इयर फोन, एक mp३ प्लयेर.. कुछ फिल्मो के टिकट  जो हमने साथ देखे थे कभी... कुछ एक नवम्बर, अनगिनत सुखद-दुखद यादें..कुछ पल... और ये चाय गिरा पन्ना चुरा कर पास रख लिया है..... जो शायद तुम्हारे किसी काम न आयें... पर मेरे लिए इनके मायने .... तुम्हारे समझ से परे हैं... 
वैसे तुम बातों को जल्दी भूल जाते हो... पर यादों के दरीचों के बीच कोई ऐसी लकीर जरुर होगी जो मैंने उकेरी होगी.... याद करना .... बुरा नहीं लगेगा....
Terms & Conditions...
एक पागल 
     

Saturday, November 27, 2010

जलते हुए सिग्रेट की आवाज़

कभी जलते हुए सिग्रेट की आवाज़
सुनी है तुमने?
एक अजीब सी आवाज़,
सन्नाटे को भेदती..
मानो उसे मिले हर ज़ख्म
का हिसाब मांगती हो...
कितनी मिलती है ना
उसकी आवाज़ मेरे दिल की आवाज़ से....?
सुन अपनापन सा लगता है.
वही चीर-परिचित सदायें,
वहीँ धुआ-२ सा माहौल..
कभी सुनना इस व्यथा को तुम,
मेरे दिल की सदाओं जैसी ही लगेंगीं,
आखिर दोनों एक ही तो हैं..
जनता हूँ, सुन कर यहीं सोचोगे
कि तुमने कौनसे ज़ख्म दिए हैं मुझे?
मैं भी सिग्रेट जला यही सोचता हूँ..
इसके सवाल बेमानी से लगते है...
मगर जलन उसका क्या?
मेरी और सिग्रेट की फितरत
लगभग एक सी हैं..
बस फर्क इतना भर ही है
सिग्रेट जलाते जलते बुझ जाती है..
और मैं बुझते-२ जल जाता हूँ...
एक जल कर भस्म  हो जाता है
और एक......
जितना बुझाओ
उतनी ही शिद्दत से जलाता है....
एक बार जरुर जलाना सिग्रेट..
शायद बुझने से पहले
ये उन सवालों को पूछ बैठे ..
जो मैं जीते-जी, कभी ना पूछ पाऊं...
एक कश जरुर लेना... शायद..
सिग्रेट की आत्मा को शान्ति मिले..
बुझने से पहले वो
उन होठों  को छू कर गुजरे..
जिनसे अब मेरा नाम ...
बमुश्किल ही निकलता हो....

Thursday, November 25, 2010

इधर-उधर से.....

१) ख्वाबों के बोझ से कुचले 
आसमां में उडान का सबब
धरती पर गिरा वो लहूलुहान परिंदा बता गया...

२) उसे कोई त्याग की प्रतिमूर्ति कहता था,
कोई महान, तो कोई देवी... सुना है वो कल रात 
गुज़र गई, पर जीते जी किसी ने उसे इन्सान नहीं समझा....

३) याद है  उस रात तुमने मेरे तकिये के नीचे
कुछ अध् खिले सपने छिपाए थे, सुबह जब
आँख खुली तो उनकी खुशबू से मेरा कमरा महका हुआ था...

४) जब भी तुम घर आये, तुम्हारे चहरे को
डायरी में दर्ज किया, आज डायरी के पन्ने 
पलटे तो देखा तुम्हारा सुर्ख चेहरा ज़र्द पड़ा था....

५) तुम तो कुछ भी नहीं भूलते थे ना..
कल सामने से यूँ निकले जैसे कभी देखा न हो,
शायद यादों के दरख़्त पर धूल जम आई होगी....

६) उस चहरे से मासूमियत झलकती थी,
कल देखा तो उस पर अनगिनत खरोंचे थीं,
हवाएं जहाँ से गुजरती है अपने निशां छोड़ जाती हैं...

७) उस अछूत के घर रोशनी कम ही आती थी 
पर कुछ दिनों से उसका घर गुलज़ार है,
सुना है, सरकार  ने सूरज की रोशनी पर भी 'कोटा' लगा दिया है...... 

Tuesday, November 9, 2010

हाशिये

खुद के लघुता का एहसास कराते,
ढलते सूरज के साथ बढ़ाते ये साये,
शाम के साथ जवां होती तन्हाई,
भूली बिसरी यादें, धुआं-२ , 
उलझे- उलझे रास्ते अनेक .
जज्बात ... मटियामेट....

मुड के जाने के रास्ते बंद,
मलाल हजारों, खुशियाँ चंद,
कुंद, एहसासों का बगीचा,
उस परी का सूना दरीचा,
खुद को दिए अनंत आघात,
वक़्त का कुठाराघात..

रिश्ते-नाते,अनकही सी बातें,
आधी-अधूरी, अधजगी सी रातें, 
डायरी मे बंद कुछ रुबाइयाँ,
मुझ पर हंसती वो परछाइयाँ ,
वो अनगिनत से आक्षेप,
कुछ हसीं से सपने.. पटाक्षेप.... 

Saturday, November 6, 2010

रतजगे

अंगने में एक सपना खिला है,
आज मैं खुश हूँ,
दूर कहीं वो जूही की 
कलि मुस्काई होगी..

छिटकी होगी चांदनी छत पे
चाँद को देखा होगा 'उसने'
शर्माया होगा चाँद ,
उसे छुपाने कोई बदरिया आई होगी.

हवा ने कुछ कहा होगा,
हौले से उस रुख को छुआ होगा 
बिखर गयी होगी लाली उसके चहरे पर,
शर्मा कर उसने अपनी पलकें झुकाई होगी..

खोला होगा उसने
जुल्फों को अपनी
चाँदी सी इस रात में 
अंधियारी घिर आई होगी..

अब महक उठा है 
मेरा कमर मोगरे जैसा
चहका सा है मंजर 
शायद  उसकी चुनरिया लहराई होगी...

सुनता हूँ सायों की बातें मैं 
अल्ह्हड़, शोख, चंचल, इठलाता 
इतराता गुजरा है एक साया घर से 
शायद उसकी परछाई होगी...

जमा किया होगा उसने 
खामोश गुफ्तगू के परतों को,
सितारों से भरी महफ़िल में
बिखरी एक तन्हाई होगी.

झांकते होंगे एक दुसरे की आँखों
में बेहिस, अधूरी होंगी बातें,
रात अभी गयी भी न होगी 
कि भोर आई होगी .........

Monday, November 1, 2010

एक और नवम्बर

नवम्बर का महीना था वो, शायद २३-२४ नवम्बर, जब चाणक्य सिनेमा की टिकट खिड़की पे देखा था तुम्हे. मेरी हताश-निराश,खानाबदोश सी ज़िन्दगी में तुम यूँ आए थे,  मानो सहरा में बरसों बाद बारिश ने दस्तक दे दी हो, बे ख्वाब, बे मकसद भटकती ज़िन्दगी को एक ख्वाब, एक मकसद मिल गया, सारी ख्वाहिशें, हर आरजू , हर एक जूस्तजू सिमट तुम्हारी बाहों मे आ गए थे. अपनी आँखों के सपनो को तुम्हारी आँखों में सजते देख रहा था, मेरी आँखों में दफन हर  एक सपना अंगडाई लेने लगा था, हर सूखी शाख पर फिर से कोपलें निकलने लगीं, एक लम्बे पतझड़  के बाद बहार ने दस्तक दी थी. 

नासमझ सा, बरसों का भूखा टूट पड़ा था इन खुशियों पर....हर पल में कई जिंदगिया जी रहा था, इस बात से बेखबर... की तुम्हार दम सा घुट जायेगा ... दम सा घुटने लगा था तुम्हारा.. भूल बैठा था मेरे सपनो के आशियाने में मेरी गोल्ड -फिश के सपने कहीं न कहीं दफन हो रहे होंगें. एक दिन तुमने खुद को Cleopatra  कहा. हैरान परेशां तुम्हारे चेहरे को देखता रहा, 'पागल..' बस इतना कह पाया था तब .... Cleopatra  वो तो मेरे जैसी रही होगी.... अपनी हठ-धर्मिता, स्वार्थ में अँधा... हर जगह गुबार फैलाने वाला.......खामोश था..... कैसे समझाता कि जिसके पहलु में कई जिन्दगानिया किलकारियां मारती हों.... जिसके साथ गुजरा हर एक पल ज़िन्दगी की किसी भी ख़ुशी से बड़ा हो, उसके साथ गुज़ारा हर लम्हा एक नयी सौगात जैसा हो...जिससे ज़िन्दगी भी जीने का हूनर मांगती हो  वो Cleopatra  कैसे हो सकती है..... 

  आपनो के दिल को दुखाने का काम तो मेरा है... डिसास्टर फैलाना तो मेरा  काम है. .... तू ऐसा कैसे कर पायेगी..... Cleopatra  .. मुस्कुराया था ...... पगली है ये लड़की यही सोचा..... उस दिन AIIMS के फ्लाई-ओवर के निचे बैठे थे न हम.. कंधे पे मेरे सर रख कहा था तुमने..." मैं तुम्हारे जैसा बनाना चाहती हूँ..... मुझे भी 'निहार' बनाना है..." बस खामोश था... आँखें नम हो आई थी.... 
कैसे समझाता 'निहार' होने का मतलब तुम्हें... 
'निहार' बन के क्या मिलेगा तुम्हे.... पगली....कुछ कहे, कुछ अनकहे सवाल.... दिल दुखाने की एक लम्बी फेरहिस्त ... नींद से लूका-छिपी खेलती रातें.... बेचैन-बेहाल , बदहवास रातें.... या फिर मीलों लम्बी मलाल......
'निहार' तुझे कैसे बताता वो खुद तुम जैसा होना चाहता है .... वो खुद एक गोल्ड फिश बनाना चाहता था... तुम जैसा ... बिलकुल तुम्हारे जैसा........
 उस दिन के बाद तुमसे दूर होना चाहता था.. दर सा गया था... नहीं चाहता था मेरा साया भी तुम्हे छू कर गुज़रे .... कहते हैं न की काज़ल की कोठारी में कितना भी बच के जाओ कही न कही कालिख लग ही जाती है... नहीं चाहता था तेरी ज़िन्दगी में एक बुरे सपने की तरह आऊं.... तुम्हारी अच्छाइयों से घबरा सा गया था.. जनता था एक दिन ये दिवा स्वप्नं जरूर टूटेगा... शायद  उन टूटे सपनो को फिर से देखने की हिम्मत न कर पाओ... तुम... शायद मैं खुद भी....... 

काश उन दिनों तुमसे दूर कर गया होता...... स्वार्थी मन बार बार तुम्हारी ओर ले जाता रहा.... खुद को रोकने की कोशिश की थी.... मगर शायद कमी सी रह गयी थी कहीं......  अपनी उठेद-बुन में गुम.. तुम्हारे और करीब आते गया.  ..एक छोटे से बच्चे की तरह दबोच तुम्हे सिने से लगा लिया था.....जान-बूझ के या अनजाने में .., भूल गया  हथेलियों में कैद चिडिया छटपटा रही है... दम घुट रहा है उसका....

" तुम बहुत नेगेटिव सोचते हो.... Be an optimist....किसी भी सपने को पाने के लिए एक उमीद किजरुरत होती है... उम्मीद मत हारना..... किस्मत   भी उनका साथ देती है जो आपना साथ देते हैं........".. तुम्हारी इन्ही बातों  से नाउम्मीदी के बवर में पड़े एक शख्स कौम्म्दी की किरण मिल गयी..... अब उम्मीद  का दामन थाम्हे आशावादी हो रहा था....बस यही न समझ पाया की कहाँ उमीद करना है कहाँ नहीं.... जाने बिना हर जगा एक उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी...... जनता था कैसे भी मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ... फिर भी तुम्हे पाने की हसरत इन्ही दिनों जवान हुयी थी.....

 तू सच में पागल थी.. किसे सुधार रही थी .... एक-२ कर नाजेने कितनी बार दिल दुखाया होगा ... अब तो मुझे भी यद् नहीं तुझसे के पुछूं ........ हर गलती के बाद एक  SORRY....  अब ये शब्द भी बेमानी हो चला है.... कोई मतलब नहीं रह गया है....
तुम अपनी जगह सही हो..... कुछ हद तक मैं भी........ मगर क्या फर्क पड़ता है सही कोई भी हो.. तकलीफ तो होनी ही है तुम्हे हो मुझे हो.. हमारे अपनों को......ऐसा नहीं की मैंने को कोशिश नहीं की, फासले मिटने की हर कोशिश ने फसलों को और बढाया है.... जनता था मेरा स्वार्थ मुझे इस मुकाम पे लायेगा एक दिन...... मगर इतनी जल्दी.... ये सोचा न था.... हथेली में रेत को भिचने चला था ... रेत को निकलना ही था.... बढ़ते दूरियों के एहसास भर से एक-एक कर दिल हर अरमान धराशाही होने लगे हैं... तुम जा रहे हो दूर या मैं तुम्हे खुद से दूर करता जा रहा हूँ.... जो भी है..... कल भी ऐतबार था आज भी है और रहेगा भी... तुम्हारे फैसलों पे... जनता हूँ जो भी करोगे सही ही होगा...आपनो को दूर जाते देखना बहुत ही दुखदायी होता है.... तुम खुद को अलग कर रहे हो मुझसे ये फैसला आसान नहीं रहा होगा..... अगर तुम इस फैसले पे ए हो तो वजह जरुर होगी...... नहीं तो तुम ऐसा कभी नहीं करते....
         
याद है उस रात अपनी आँखों से निकल कुछ सपने दिए थे...कहा था संभल लेना.. मेरे पास मेरा अपना बस यही है.... संभल के रखना उन्हें...... गुजारिश है तुमसे... वो अपने तकिये के नीच कुछ सपनो कैद किया था तुमने..... किया था न तुमने? कभी फुर्सत मिले तो देखना कोई तो ऐसा सपना होगा जो तुम्हारे सपने से मेल खाता होगा.... कोई न कोई जगह जरुर होगी जहाँ हमरे सपने मिलते होंगें....... या मेरा कोई सपना जो तुम्हारा होगा.. या तुम्हारा कोई सपना मेरा होगा..... ..वक़्त के किसी मुकाम पे इन सपनो की मुलाकत जरुर होगी... इतनी गुंजाईश जरुर रखना की इन अधखिले , आधे अधूरे सपनो को जीने का मौका मिले...... जनता हूँ ये मुश्किल है  की तुम्हारे किसी सपने में मेरी कोई जगह हो..... कही हो तो बताना जरुर.....

उस रात जब तुम जा रहे थे नाराज़ हो.. धुंध से बहरे उस वीरान सुनसान सड़क पे ... स्ट्रीट lights ऐसी लग रही थी मानो हवा में अलाव जला रखा हो किसीने... एक अलाव तो मेरे सिने में भी दफन थी... रोशनी पे धुंध जयादा हावी थी उस रात....  आँसू के हर कतरे ने सिफारिश की तुम्हारी, कहा रोक लो .... हाँथ बढाया भी... मगर गुनाहों से भोझिल , मेरे कापते लबो से कोई आवाज न आई..
  तुम्हे जाते हुए देख रहा था.... तुम्हारे पैरों के निचे आये हर पत्ते ने दस्तक सी दी थी मेरे सिने में... धुंध ने धीरे-२ तुम्हे लपेट लिया था.. साया भी गुम गया कही... कदमो की आहात भी नहीं आ रही थाई... फिर भी वही खडा था... बहुत देर तक...

   एक उम्मीद, एक विश्वाश , एक आस यही दिया है तुमने..... बुबरा कभी भी ना उम्मींद  न होने के वादे पे अभी कायम हूँ .. उम्मीद है तुम्हारी... तुम्हारे वापस आने की ... विश्वाश है खुद को संभाल पाने की... आस तो ... तुम हो ना....

यह भी एक नवम्बर है... कितना अलग उस नवम्बर से ... मगर मेरे हालात अलग नहीं हैं... बस लोग चेहरे अलग हैं.. गुनेह्गर हूँ..... अपनी इस हालात का खुद ही जिम्मेदार हूँ.....  मगर वादा  रहा इस  हाल  में ना तुम्हे रहने दूंगा  .. और ना ही खुद  को कभी पाउँगा....
पिछली बार जब आये थे, मुस्कुराते हुए.. गुलमोहर की तरह..... ज़िन्दगी में मेरे.... उम्मीद है फिर से आओगे..... पिछली बार मिले थे तो कद्र नहीं कर पाया था.... तुम्हारी पहचान नहीं कर सका.... हीरे की परख तो परखी कर सकता है.. मैं एक आम सा आदमी...गवां बैठा तुम्हे......अबकी बार ऐसा नहीं होगा......

माफ़ी के लायक तो नहीं हूँ मगर कर देना अगर संभव हुआ तो......

तुम थे तो सब था ...... नहीं हो तो कुछ भी नहीं.......दिल की हर धड़कन कहती है... " दोस्त आजाओ या बुला लो....... "
मैं अभी वही खडा हूँ तुम्हारे इन्तिज़ार में......
तम्हारा 
'निहार'

Friday, October 1, 2010

चलते -फिरते

१) शाम की लालिमा ओढ़े विशाल व्योम को देखा,
रात को जलते बुझते जुगनू से कुछ  सपने,
अब आसमान छोटा  और सपने बड़े लगते हैं मुझे! 

२) उसकी आवाज़ वादी में गूंजती रहती है,

कहते हैं वो बहुत सुरीला था कभी,
पर लोग अब उसे कश्मीर कहते हैं...







३) वो आग जैसी थी, सूरज सी गर्म  

उसके एक  इशारे पर हवाएं अपना रुख बदल लेती थी,
सुना है कल अपन घर जला बैठी है वो....





४) बहुत ऊँचा उड़ाती थी वो,

आसमान में सुराख़ कर आई,
सुना है उस सुराख़ से खून टपकात है उसका....

Tuesday, September 21, 2010

वक़्त



तुम नहीं थे , मैं खुश रहता था,
तुम कहीं नहीं हो सोच दिल बहल जाता था,
मैं दुखी  हो जाऊंगा, जब तुम आओगे
यह सोच अक्सर दहल जाता था.....
ऐसा ही कुछ हुआ भी....
तुम आये  और .......
आखिर क्यों....
तुम्हारे होने का एहसास भर
भीतर से गुदगुदा  देता था,
दुःख, रंजो-गम, परेशानियों 
का वजूद दिल से मिटा देता था...
अब तुम्हारे होने का एहसास 
तुम्हे खोने के एहसास से दुखदाई क्यों है?
तुम नहीं होके भी होते थे... अब तुम 
हो के भी नहीं हो, फिर अँधेरे में भी 
ये परछाई क्यों है....
अब ऐसा क्या बदल गया,
रिश्ते का सूरज साँझ में क्यों ढल गया...
तुम वही हो, मै भी वैसा ही हूँ 
बस जज्बात पराये हैं, 
वक़्त ये कैसी चाल चल गया,
दिल बुझ  गया, अब रातें सुनी हैं,
फिर तुम्हारे आते ही मैं क्यों जल गया?
तुम नहीं होते हो तो 
करवटें लेता है वक़्त मेरी ज़िन्दगी में..
तुम आते हो, और तुम्हारे हो कर भी न होने का 
सबब पूछते हैं ये गलियां ये मंज़र, 
मेरी इस ज़िन्दगी में...
मैं चुपचाप भाग लेता हूँ, 
खिडकियों को ढांप देता हूँ, 
आईने से ऑंखें नहीं मिला पाता हूँ 
तुमसे सामना न हो जाये सोच के 
यह घबराता हूँ,
पता नहीं किस से छिप के भाग रहा हूँ
तुमसे या खुद से..?
कहते हैं वक़्त गुज़र जाता है 
मगर ख़त्म नहीं होता...
हर रोज आग लगाता  हूँ, अपनी आरजू के वृक्ष को मगर
वो ढीन्ठ भस्म नहीं होता!!!!!!!!!!!!! 

Saturday, September 18, 2010

अरमानों की चिता

वहां के लोग त्रिशंकु हैं,
या वो जगह ????
नहीं जानता कोई.....
हर पल कहीं न कहीं
सुलगता रहता है 
पल पल जिंदगानियां बदलती हैं,
शहर ये हर पल जीता और मरता रहता है .
कहते हैं कभी बर्फ में खो जाती थी 
चमक सूरज की  
धुंध में देवता रमते थे जहाँ 
अब धुआं-२ सी आबोहवा है इसकी,
भटकते रहते हैं बंदूकधारी दानव यहाँ...
सोचता हूँ यूँही 
तेरे बारे में ये 'काशीर'
तेरी वो थाती ... तेरा गौरव
चिनाब और वो झेलम का तीर!
देखता हूँ तेरा दामन और रोता हूँ, 
इस पर हर जगह दाग सा बना क्यों है ?
कभी पाक, कभी नापाक 
हर हाँथ तेरा खून से सना क्यों है ?
न जाने कितने वादे तुझको भरमाते हैं 
ज़न्नत कहते हैं लोग तुझको,सही तो कहते हैं,
तू ज़न्नत ही होगा तभी तो 
जिंदा लोग तेरे दर से कतराते हैं....
तेरी हवा में खून की बू सी आती है 
थुथने भर जाते हैं
जान हलक में अटकने लगाती है 
और मौत कभी भी छू सी जाती है..
धूं धूं कर जलती है तेरे अरमानो की चिता
ज़िन्दगी सहमी-२ सी है और मौत की हर वक़्त शान है
हैवानियत हर वक़्त इतराती है 
तेरा लिहाफ वर्षों से लहूलुहान है.
शायद तू मुर्दों की एक बस्ती है 
या कहूं की एक जिंदा शमशान है ...   

Thursday, September 9, 2010

उजाले की आस



उस झोपड़ी के आगे 
दिया रोज टिमटिमाता है,
सूरज के बुझते ही वो बूढ़ा
रोज चिराग जलाता है.

अँधेरा घना है सूरज रास्ता भटक जायेगा
कहता है और मुस्कुराता है.
दिया जला हर मौसम में 
दिवाकर को अपने घर का पता बताता है.

कह कर गयी थी वो उससे की वो चाँद है
सूर्य किरणों से ही जलती है
रौशनी में ऑंखें चौधियाती हैं 
इसलिए छिप कर अँधेरे में निकलती है.

तबसे किसी ने उसे थकते नहीं देखा 
कहते हैं उसके घर उम्मीदे बरसती हैं.
उजाले की आस में जीता है हर रोज
अँधेरे की सांसे उसकी देहरी लांघने को तरसती हैं.

उजाले का पुजारी जो ठहरा
सूरज से लाली चुरा चाँद को चमकता है
गुम न हो जाये अँधेरे में सूरज कहीं इसलिए
दिया जला भोर तलक सूरज को रास्ता दिखलाता है.

तन से बूढ़ा है, पर मन से जवान,
रुकन,थकन जैसे अहसासों से बिलकुल अंजान,.
तिमिर नहीं आता कभी उस घर के आस-पास
लाखो जुगनू बसते हैं उस घर में
बस्ती है वही उजाले की आस......

कहते हैं न जहाँ रौशनी होती है वहां कभी अँधेरा नहीं होता.....

Friday, September 3, 2010

कुतरे पंख





पंख पसार
कर हौसले का विस्तार 
तोड़ कर हर बंधन 
छूने चली वो विशाल गगन 
परों में समेटे दूरियां, आसमान छू आयी वो,
कल्पनाओं से परे, अपने हौसले के संग,
कतुहलता से भरे लोग उसे देखने को थे लालाइत 
सूरज भी देख उसका दुस्साहस था दंग.
आसमां में एक सुराख़ सा दिखने लगा था,
विजयी मुस्कान लिए अपने घरौंदे में लौट आई.
हर तरफ उसके साहस का चर्चा, उसके 
हौसले का दंभ.. किसी पुरुष मन को नहीं भाई.. 

सुबह लहूलुहान सी घोसले के निचे वो पड़ी थी  
कुतर दिए गए थे उसके पर, उसे घेरे भीड़  खड़ी थी,
उस दहलीज पर यमराज डोली लिए थे खड़े,
मायूस था मंजर, खून से नहाये कुतरे पंख वंही थे पड़े.
सांसें रुक गयीं थी,
जान जिस्म में थी दफ़न,
एक विशाल जन समूह जा रहा था अंतिम यात्रा में 
ओढ़ाये एक सम्मान का कफ़न.
सूरज ने छिपाया अपना मुंह 
घनघोर काली बदरिया घिर आई
कल तक साहस जहाँ बिखरा पड़ा था
वहां मौत ने मातम की चदरिया फैलाई.
अग्नि ने सौहार्द पूर्वक उसे अपनी अंचल में लपेट
उसके होने का निशां मिटा दिया.
आसमां के उस सुराख़ से खून टपक रहा था
इन सब से बेखबर, एक उत्साही कुतरा पंख  
फिर से आसमां छूने को बेकरार
 अभी भी फुदक रहा था.............

Tuesday, August 31, 2010

माँ, मैं और तुम!



सूरज निकलता है और शाम में ढलता है,
ऋतुएं बदलती है और काल-चक्र चलता है. 
बस तुम नहीं हो..... 
अब मैं बिन कहे माँ के दिल 
की हर बात जान लेता हूँ...
उसके हर कहे-अनकहे बातों को 
बेहिचक मान लेता हूँ...
मैं यह सोच खुश हूँ,
माँ बहुत खुश होगी..
पर माँ को लगता है 
मैं चुप हूँ और मेरी ख़ामोशी
बहुत बोलती है..
सुनती ख़ामोशी की सदाओं  को मेरी
और हर पल उन्हें तोलती है
कहती है, तू बहुत बदल गया है,
तन्हाई के सांचे में ढल गया है,
एक अजीब सा ठहराव सा आने 
लगा है तेरी गति में..
तू आदमी नहीं मशीन हो गया है,
नूतन नवीन जीवन में प्राचीन हो गया है.
अब मैं माँ को बावला सा नज़र आने लगा हूँ,
और माँ मुझे बावली सी...
उसे नज़र आती हैं तुम्हारी स्याह यादें,
प्रत्यक्ष, परोक्ष एवं उतावली सी..
तुम्हे गए ज्यादा वक़्त तो नहीं हुआ,
तुम नहीं हो..
फिर भी किसी निराशा ने तो मुझे नहीं छुआ...
मैं मुस्कुराता हूँ,
ये बातें, माँ को समझाता हूँ,
कहता हूँ माँ देख..
सब कुछ तो यथोचित ही तो चल रहा है,
कल भी यूँ ही जलता था ये सूरज 
आज भी तो जल रहा है..
कहती है वो, सब कुछ तो नहीं है वैसा,
कहता है तू मुझसे जैसा..
कल तक तू तो बच्चा था, 
अचानक से बड़ा हो गया है,
पहले दूर हो कर भी पास था,
अब पास हो कर भी कहीं खो गया है.
तू भी तो यहीं चाहती थी न माँ, 
कि मैं बड़ा हो जाऊं?  
याद है तुझे .. बिन बात मैं तुझसे कितना लड़ता था,
जो चाहा वही किया,अपनी हर जिद पर बेवजह अड़ता था..
वो चुप हो जाती है, मुस्काती है,
पर कुछ न कहती है,
हर पल जाने किस सोच को 
मथती रहती है..
उसकी इस हालत पर मैं हूँ हैरान,
मेरे रवैये पर वो है परेशान..
दोनों सोचते हैं, 
तुम्हारे ना होने भर से ये बदलाव कैसा?
वक़्त के साथ कदम ताल करते हुए भी,
जीवन से ये अलगाव कैसा?
वो नहीं जानती है...
मैं नहीं जनता हूँ,
कि तुम क्यों नहीं हो.....