Saturday, August 9, 2008

एक कविता: ये जिंदगी क्या है?


इंटरव्यू दे हताश-निराश घर लौटे हुए,
पसीने से तर-बदर , थक कर,
मेज़ पर फैली times ascent की कतरनों के बीच रिज्यूमे की फाइल रख कर ,
अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है?

एक बुझते सिग्र्रेट से निकलता जलता हुआ धुआं,
बरसात के मौसम में पानी को तरसता एक कुआँ,
शेयर बाज़ार के संग डूबता-उतरता इन्सान खेलता हुआ जुआ।
अक्सर सोचता हूँ मैं ये जिंदगी क्या है?

संसद में नोट,
परमाणु करार पर वोट,
TV से चिपका इन्हे देखता एक सख्स
खाए दिल पर चोट,
T.R.P. की रेस में खोई मिडिया,
सिंगूर-श्राइन में उलझी इंडिया।
अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है?

एक घुसखोर ऑफिसर की जेब से बहार झांकती नोटों की गड्डी,
सामने की चाय की दुकान का छोटू और बगल में जलती कोयले की भट्टी
एक टूटी कश्ती पर सवार आम आदमी हालत के थपेडों से पस्त ,
पब में होती एक पेज -३ पार्टी टकीला-पटियाला पी मस्त
अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है?

सुने सड़क को निहारती एक जोड़ी पथराई आँखें सीने में दफ़न होती एक बूढी साँस,
हाँथ में वोटर I.D. लिए एक नए नवेले वोटर की
लोकतंत्र से टूटती रही सही आस
अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है?

Tuesday, July 22, 2008

खून ...........(लधु कथा )

साला , madhadchod ... हरामी सूअर की औलाद............गालियाँ मध्धम होती गई..... चिलचिलाती धूप हरी राम को वापस वर्तमान में ले आई ... पसीने की वज़ह से बदन से चिपक गए कुर्ते को हाथों से शरीर से अलग करने लगा मगर कुर्ता तो फेविकोल की भांती चिपका पड़ा था ....अभी तो ३ ही बजाए थे घड़ी ने.... सड़क के किनारे नीम के पेड़ के छाव में बैठा गया.... दिल घर जाने को बेकरार था मगर ..ना जाने कितने ही सवाल उसके आने के इन्तिज़ार में खड़े होंगे मोहल्ले में.... बात सिर्फ़ मोहाल्ले के लोगों की होती तो नही डरता दिन में जाने से .. मगर गोलू के सवालों का क्या जबाब देगा? पापा पापा क्या अपने ४ लोगों को मार डाला है, अपनी बस से कुचल... किसने बोला तुझसे ये... गला घोंट दूंगा साले का....... जो मेरे बेटे को अनाप सनाप पट्टी पढाएगा....किस-किस का गला घोटोगे तुम.... मेरी किस्मत ही फूटी थी जो शादी की तुम से... पापा तो संदीप से शादी करा रहे थे delhi पुलिस में था... उससे शादी होती तो ये बार बार जेल में नही आना पड़ता .. आती भी तो एक पुलिस वाले की बीबी बन .. एक सजायाफ्ता कैदी से मिलने नही..... ३ साल में दूसरी बार सज़ा कट रहे हो............ बहन की लौंडी..ज्यादा जबान चलाएगी तो मुह तोड़ दूंगा .. एक बार बाहर आने दे । फिर तेरी .....................
ये सब उस हरामी डीटीसी के ड्राईवर की वज़ह से हुआ था.... साला पैसे ले कर भी ओवर टेक कर रहा था... नीम के पेड़ से झर झर कर सूरज की रौशनी उसे उसके बदन को नहला रही थी पसीना बदस्तूर बहे जा रहा था... धरती का पारा उसके गुस्से को भी बढावा दे रही थी ... उठा था वहां से ... अब घर जाना था उसे... अब नही रोकेगा अपने पैरों को... क्यो रोके ? ऐसा भी क्या गुनाह कर दिया था उसने ? उस बाइक वाले की ग़लती नही थी?.. ४ लोगों को बैठा रक्खा था ? उन हरामियों को उसी के बस की निचे मरना था? भाग ही जाता अगर उस स्कूल के छोकरे ने नही पकड़ा होता... २-३ तो लगा भी दिए थे....मगर भिंड जमा हो गई थी तब तक..कदम फिर से रुक गए.. स्टैंड पर जा बैठा...एक स्च्चूली बच्चे रोड को भाग कर पर करते देख , बौराए कुत्ते की तरह दौड़ पड़ा उसके पीछे... चूतिये की औलाद..पटक.. माँ....... बचाओ...बिन मौसम लात घूसों की बारिश... स्क्कुली बच्चा .. बैग छोड़ जान बचाने को भगा. ....छोडो मुझे इसे मैं बता दूंगा ...रोड क्रास करने सिखाऊंगा...गटागट ४ गिलास पानी पी गया ..२ रुपये के लिए हाँथ जेबें टटोल रहे थे ... ऑंखें रोते बच्चे को.... कण कुछ और सुनाने को तैयार नही.... भीड़ क्या कह रही थी.... कोई मायने नही था ....... लम्बी -२ सांसे ले ख़ुद को नियंत्रित कने की कोशिश जारी थी..... भीड़ में खड़ा हर चेहरा दुश्मन ही नज़र आ रहा था.. एक स्चूली लड़का ... उसे धर दबोचने को तैयार..... कोई अपने जुटे हाँथ में लिए उसे मरने को उतारू ... कोई घुसा ताने उसकी तरफ़ दौड़ता......... अपने कपडे खुनसे सने ......... आँखे बंद कर बैठ गया...... बस रुकने की आवाज़ से जब आंख खोली तो ... बस के टायर खून से सने दिख रहे थे... उनके बिच फंसे बच्चे के शरीर से अभी भी खून टपक रहा था.... ऑंखें बाहर लटकी पड़ी थी..... आआआआआआआअ .............................. चिल्ला उठा ...... क्या हुआ? लगता है कोई सपना देख रहा था.... सही है बही हमे तो रातों को भी सपने नही आते और इन्हे तो दिन में ही......... हा ह अह हा हा हा /........ कानों छेदती हँसी ...... कहाँ जाना है?... भइया संगम विहार जाओगे........ ऑटो चल पड़ा......


आधे खुले दरवाजे से झांकती आँखें ... नज़रे मिलते ही सर झुका ली अपनी..... ऑटो का किराया देना है... हिम्मत नही जुटा पाया की बहार देख ले... कितनी ऑंखें इन्तिज़ार थी... या नही थी...... बस ऑंखें मूंदे खटिये पर जा गिरा... शुतुरमुर्ग????????/ नही नही.... ...... मान बैठा कि अब वो महफूज़ है...... इस बार मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान हुआ पड़ा था डेल्ही पर....... ३-४ दिन गुजरते ही अब सामान्य हो चला हरी राम ....... शौच के बाद हाथ धोते.. नहाते वक्त अपने हाथों को खूब निहारता ...... साबुन ने खून के दाग धो डाले थे.... बस के टायरों के बिच पासा बच्चा गायब हो गया था..... .. मगर अभी बहार जाने से डर लग रहा था.... आने के बाद एक बार भी अख़बार पर नज़र नही डाली थी.... टीवी तो भूल कर भी नही देखा.... मिडिया वाले तो हाँथ धो ब्लू लाइन के पीछे पड़े हैं.... किलर लाइन ... ना जाने कितने नाम..... पाचवे दिन घर से निकल ही पड़ा .. स्कूटर पर ... लाडो और गोलू को ले.... सफ़ेद कुर्ते में कही भी दाग नही थे.... धुल जो गए थे....... हौज़ खास से ही ट्रैफिक उसी के स्वागत में खड़ी मिली.... मुनिरका तक पहूचते-२ हार्न की आवाज़ ने अच्छे मूड का गुड गोबर कर दिया था.... अब उसे जल्दी से पालम पहुचना था...... तेजी से निकला ..... जगह जगह फ्लाई ओवर बन रहे थे........ हर जगह diversion ..... मलाई मन्दिर के आगे के रेड लाआईटी पर रुका ही था कि........ चूऊऊऊऊओ धडाम................. मरो साले... भागने न पाए..... मधाद्चोद ब्लू लाइन वाले....साला , madhadchod ... हरामी सूअर की औलाद............गलियां अब तेज़ होती जा रही थी.. .. .हर तरफ अन्धकार......... हिमत जुटा ऑंखें खोली... ..ड्राईवर को पिट रहे थे लोग...... अरे ये ड्राईवर कौन है..... अरे वही है हरी राम ही.है वो ख़ुद है ड्राईवर के भेष में .. किसीने सहारा दे खड़ा किया ...बस के पहिये को देखा.... बिच में फसा बच्चा अब साफ साफ दिख रहा था..... ये तो गोलू है.......लाडो का सर खून से सना हुआ क्यो है.....? कुरता लाल क्यो होता जा रहा है ? ... खून के दाग ही दाग नज़र आ रहे है.... कुरता फ़िर से चिपकने लगा है.... खून तो फैलता ही जा रहा है ......हाँथ खून से सनने हुए क्यो हैं..... कुछ समझ नही पा रहा था हरिराम... दौड़ कर पास के फ़ुट पथ पर हाथ साफ करने लगा...बार-२ हाँथ को मिटटी में रगड़ रहा था॥ ........खून के दाग मिटे कब हैं.. जो मिट जाते ...... गोलू अभी भी टायर में फसा नज़र आ रहा था ..और ... खून टप टप टपक रहा था .... ड्राईवर की पिटाई बदस्तूर जरी थी...........

Monday, June 23, 2008

अंगूर खट्टे हैं-4

लोमडी की आँखें ... या निहार की आँखें....... ... आँखें जो बिन कहे सब कुछ कह जायें....... आँखे जिसने कभी भी निहारिका से झूठ नही बोला........ निहार की ही हो सकती हैं ये आँखें ........... और इन आंखों ने देखते देखते उसे माज़ी (अतीत) के हवाले कर दिया... याद आ गया वो दिन जब वह निहार से मिली थी....... .उस दिन काल सेंटर जाने का मन बिल्कुल ही नही था। मगर जाना ही पडा... सुबह घर पहुचते ही अनिकेत का कॉल ... लडाई... फिर पुरे दिन सो भी नही सकी ... शाम को ओफ्फिस ॥ वही रोज की कहानी .... सर दर्द से फटा जा रहा था ... काम छोड़ .... बहार निकल गई, कॉरिडोर तो पुरा सिगरेट के धुएं से भरा था .. 'पता नही लोग सिगरेट पिने आते हैं या काम करने ' ........... कैंटीन में जा कर बैठ गई.. अपने और अनिकेत के रिश्ते के बारे में सोचने लगी ... न जाने किस की नज़र लग गई थी....वह ग़लत नही थी.. अनिकेत भी ग़लत नही था अगर उसकी माने तो.. फिर ग़लत कौन था...और ग़लत क्या था.. ..अब उन्हें एक दुसरे की उन्ही आदतों से चिड होने लगी थी जिन पर कभी मर मिटते थे.. आज-कल उसे कोई भी वज़ह नही नज़र नही आ रही थी जिसकी वजह से दोनों साथ रहें .. फिर भी साथ क्यो हैं? .. एक आदत एक दुसरे के साथ की.. या कुछ और.. अगर यह आदत है तो फिर एक दूसरे की आदतों से ही परेशानी क्यो है..? स्कूल के दिन याद आ रहे थे .. कितने अच्छे थे.. कम से कम future , career ... इनका टेंशन तो नही होता था... या इन बातों को ले कर कभी भी लडाई तो नही होती थी.. स्कूल जाते वक्त नुक्कड़ पर बजाते गाने याद आ रहे थे.. .. रोज सुबह की वह बेकरारी की आज कौन सा गाना बजाय जाएगा उसके लिए.. सुबह अनिकेत ना जाने कब से खड़ा रहता था वहां अपनी साइकिल ले.. शायद ही कभी हुआ जब उसे वहां नही पाया हो.. कितना अजीब लगता था जब उसे नही देखती थी वहां ... वह पहली बारिश.. जब सावन बरसे तरसे दिल .... बजाय गया था... कितना भीगे थे वो दोनों उस बरसात में.... आज भी बारिश हुई थी ......और आज भी भीगी थी ......आसूओं के सैलाब में.......

Tuesday, June 17, 2008

अंगूर खट्टे हैं....3

आँखें ठहर सी गई उस पेंटिंग पर .... पेड़ के नीचे खड़ी लोमड़ी.... अंगूर के गुच्छों को एक टक देखती लोमडी की आँखें ... थोडी अलसाई .. थोडी नशीली ... थोडी नींद से बोझिल आँखें निहार के अलावा किसकी हो सकती थी........
"तो तुम्हे सच में ये लगता है की मुझे तुमसे एक दिन प्यार हो जाएगा?" IIT कैंटीन में बैठे निहारिका ने निहार से पूछा था..
"हाँ"
"हा हा हा हा ... तुम जागते हुए सपने देखना कब छोड़ोगे?"
"यह हकीकत है "
"ओह रिअली ! यू मीन आई विल फाल इन लव विद यू?"
" हाँ"
" हे हे हे... " निहारिका की हसी रुक ही नही रही थी.. " मजाक तुम से अच्छा कौन करेगा..?"
"मजाक नही है यह... प्यार करने लगोगी तुम मुझसे.."
"नो वे"
"शर्त लगा रहे हो?"
"हार जाओगे .."
" मुझे हारना नही आता "
" तो अब सीख जाओगे"
" तुम शर्त लगा रहे हो ?"
"अब हारने को कोई मरा जा रहा है तो मुझे क्या! डन!.."
" वह तो वक्त ही बताएगा ..."
" तुम और तुम्हारा optimism... ! वैसे तुम्हे पता भी है कि प्यार किसे कहते हैं ?"
बस एक खामोश मुस्कराहट थी निहार के चहरे पर..
" मैं और अनिकेत पिछले १० सालों से एक दूसरे को प्यार करते हैं.. उसके अलावा किसी और का ख्याल आ ही नही सकता मेरे मन में..!
" अच्छा जी ! तो आप रात के ९ बजे अनिकेत से छुप मेरे साथ इस कैंटीन में क्या कर रहे हो...?"
" क्योकि तुम मेरे दोस्त हो."
"दोस्त तो और भी हैं फिर ..."
" वह हामारे रिश्ते को नही समझ सकता! उसे तो तुम्हारे नाम से ही चिदहै.."
" हूँ .. तो क्या तुम हामारे रिश्ते को समझते हो.."
दूसरी तरफ़ सिर्फ़ एक खामोशी थी.
"चुप क्यो हो गए?"
"यह बकवास बंद करो तुम ! और ये बात आपने दिमाग से निकल दो तो बेहतर होगा कि मैं तुम्हे एक दोस्त से से कुछ ज्यादा समझती हूँ . यहाँ सिर्फ़ हार ही मिलने वाली है तुम्हे !" आवाज़ की चिड-चिदाहट साफ पता चल रही थी ...
"जीत तो सिर्फ़ निहार की ही होगी."
"ओ.के. सपने देखते रहो कि . तुम जीत जाओगे . और मेरी शादी तुम से हो जायेगी..है ना?"
"तुमसे शादी करनी भी नही है मुझे .."
"हा हा हा हा.." अब उसकी हंसी रुकने का नाम ने ले रही थी.......... तुमसे शादी करनी भी नही.... हे........हूँ अंगूर खट्टे हैं ना?"

सिर्फ़ मुस्करा कर रह गया निहार.
"अंगूर खट्टे हैं ना? हे हे हे ... तुम नही जीत पाओगे "
" जिंदगी एक अजीब पहेली है मेरे दोस्त! जिसकी कोई शिकस्त हमें जीत से ज्यादा हसीन लगाती है. उस हार का नशा जीत के खुमार से ज्यादा होता है !"
"हूँ?"
"तुम जीते तब भी मेरी ही जीत होगी, अगर मैं जीता तो कहना ही क्या..."
"मेरी जीत मे तुम्हारी जीत कैसे हो सकती है.. ?"
" क्योकि प्यार में कभी हार नही होती! तुम्हारी जीत यानि कि उसकी जीत जिससे मैं प्यार करता हूँ. और मैं जीता तो... अब बताओ मैं हारा कहाँ?
उसके चहरे को गौर से देखे जा रही थी निहारिका और वो अपने धुन मे बोले जा रहा था.
"वैसे मैं ये दुआ करूंगा कि शिकस्त मेरे ही हिस्से आए !"
" भला वो क्यो?"
तुम्हे हारते हुए नही देख पाउंगा!"
मन मे आया एक बार फिर कहे "अंगूर खट्टे हैं" मगर कुछ कह नही पाई..
"वैसे सारी रात यही गुजरने का इरादा है क्या किसी का?"
चुप चाप उठ उसके पीछे चल पड़ी.. उनके बीच आ चुकी खामोशी ने वार्तालाप का अंत कर दिया था..
धडाम -२ हवा से बजाते खिड़की के पल्ले ने निहारी को वर्तमान मे लौटने पर मजबूर किया.. उसे बंद कर दुबारा पलंग पर बैठ गयी! और नज़रें दुबारा पेंटिंग का दीदार करने लगी..

Monday, June 16, 2008

अंगूर खट्टे हैं भाग -२

साफ सफ़ाई का दौर जब एक बार जब ख़त्म हुआ तो घर में अब तक मौजूद मेहमान शादी और रिसेप्शन में मिले गिफ्ट्स के पोस्टमार्टम में लग गए...
" भाभी ये क्या मिला है इस पर तो देने वाले ने अपना नाम तक नही लिखा है "
"ऐसा क्या मिला है? " निहारिका भौच्चाकी सी रह गई जब उसने देखा उस गिफ्ट को , कुछ और नही बोल पाई !
"किसने दिया होगा?"
"ये मैं कैसे कह सकती हूँ" अनमने ढंग से जबाब दे अपने कमरे मे चली गई.
"क्या मिला है"...
"एक पेंटिंग है .. देने वाले ने अपना नाम भी नही लिखा है........"
बाहर के कमरे से आती आवाजों से पीछा नही छुडा पाई वह ....
" होगा कोई पागल...." एक आवाज़ फिर गुंजी ..
पागल ही तो था वो... ...तो शादी मे आया था ………………..या किसी से भिजवा दी थी इस पेंटिंग को.. वादे का पुरा पक्का निकला.... निहारिका कहीं गुम होने लगी थी यादों के साये मे...... …और.. कब नींद आई क्या पता उसे... जब आंख खुली तो ... पाया पेंटिंग अभी भी एक "hot topic " थी घर में ......जितने मुह उतने कयास ... किसने... क्यो.......????? हर इन्सान करमचंद या ब्योम्केश बना पड़ा था....
पेड़ से अंगूर के गुच्छे... नीचे ललचाई निगाहों से देखती एक लोमडी.. और कोने men लिखा अंगूर खट्टे हैं..... ! कुल मिला एक बेढंगा और बे मतलब का गिफ्ट! और ऊपर से देने वाले ने अपना नाम तक लिखने की जहमत नही उठाई ... क्या कुछ नही था इसे घर मे एक 'hot topic' बनने के लिए...
दिन ने करवट बदली ....सांझ की दस्तक के साथ ही इन 'खट्टे अंगूरों' को निहारिका के कमरे के सुपुर्द कर दिया गया..... धीरे धीरे सांझ ने भी रात के लिए अपनी जगह छोड़ दी...दिन भर के शोर शराबे के बाद पहली बार एकांत मिला निहारिका को... अनिकेत का कोई अता पता नही था ... बैठा होगा वही नुक्कड़ वाली चाय की दुकान पर ....... चाय वाला और उसकी पसंदीदा संगीत दोनों का कोई जबाव नही.... दिन भर की गर्मी शाम की बूंदा baandi के साथ ही काफूर हो गई थी.. पूर्वा हवा ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था.... "आज मौसम बड़ा बेईमान है ,,,,,,,,,,,," चाय की दुकान पर बजाते गीत की स्वर लहरियाँ कमरे तक आ रही थी... उफ़ चाय के दुकान पर बजने वाले ये फिल्मी गाने... १० साल से ज्यादा हो गए ........ स्कूल जाते वक्त अनिकेत का वहाँ खड़े हो उसे स्कूल जाते देखना ..... स्कूल.... फिर कालेज ... फुर्र हो गए थे वो दिन... सब बदल गया इन १० सालों में ... स्कूल... कालेज .. कब के पीछे छूट गए... लेट गई वह अपने बिस्तर पर ... आँखें कमरे का मुआयना करने लगी..... परदे से लेकर कमरे में लगे रंग तक हर जगह उसके पसंद का ख्याल रखा गया था.....नज़र दौड़ते दौड़ते उस पेंटिंग पर जा टिकी.. पैर अपने आप उधर ही चल पड़े....

Sunday, June 15, 2008

अंगूर खट्टे हैं ... भाग -१

शिवाजी टर्मिनल पर खड़ी ढेर सारी लो फ्लोर बसों को देख निहारिका १०-१२ साल पहले की दिल्ली को याद करने लगी, वाकई दिल्ली काफी बदल गई थी इन दस सालों में... आज दिल्ली आते ही अनिकेत से बोल पड़ी थी कि बस मे ही घूमेंगे पुरानी यादें ताज़ा हो जाएँगी.. हौज खास जाना था एक लो फ्लोर ६२० नंबर की बस खड़ी देख जा बैठी उसमे , अनिकेत भी पीछे पीछे आ गया. बस खाली थी. वैसे भी दोपहर मे कौन आता होगा? सोचा उसने.. याद आ रहे थे वो दिन जब वो ६२० मे अक्सर जाती थी मुनिरका तक. डीटीसी की खटारा बसो मे या ब्लू लें में ! तब ऐसी बस क्यो नही चलती थी? हूँ.. इक्के दुक्के लोग चढ़ने लगे थे बस मे .. १० मिनट मे ड्राइवर आ गया और धीरे धीरे बस सरकने लगी .. C.P. मे गुज़रे हर पल कितने हसीन थे... और कैसे भूल सकती थी वो C. P. की परिक्रमा ........ उस दिन कितना थक गई थी वो... जंतर मंतर के बस स्टॉप से एक युगल उनके सामने की सीट पर बैठ गया, शायद लवर्स ही होंगे अब दिल्ली को भूल उन्हें देखने लगी .. " वैसे प्यार तो मैं अपने रोहित से ही करती हूँ .... ........ तुम बस मेरे दोस्त ही हो ......समझते क्यो नही हो तुम ? हाँ मुझे तुम्हारी कम्पनी पसंद है, तुम से बातें करना अच्छा लगता है मगर मैंने तुम्हे सिर्फ़ एक दोस्त की तरह ही देखा है............. और ........." इससे आगे उस लड़की ने क्या कहा सुन नही सकी, ऐसा लगा बहरी हो गई है, उसने भी तो ऐसे ही कहा था कभी... किसी से ... कही .किसी रोज ऐसे ही एक बस मी..... अनिकेत अब भी एकोन्मिक टाईम्स मे खोया था, उसके कंधे से सर टिका बाहर देखने लगी.. युवक और युवती की बातें सुनाने की कोशिश करने लगी मगर ... दिल राजी नही था उसके लिए... अतीत दस्तक देने लगा .. आँखें मूंद ली , हाथों ने उनसे बह आए आँसुओ को पोछ दिया..... वर्तमान धुंधला गया ........

"हे भगवान कोई सहूर भी इस लड़की को २० साल की होने को आई है मगर.......... , जंहा देखों वही समान बिखरा पड़ा है . स्वाती इस घर को साफ करो, और अलमारी से सारे गिफ्ट्स निकालो देखते है क्या मिला है .... इस शादी मे !" पल्लू से माथे पर उग आए पसीने की बूंदों को हटाते हुए चंद्रा सोफे पर जा बैठी. " भाभी ये माँ भी न कभी कहीं भी चैन से बैठने नही देती. आती हूँ, घंटे भर की छुट्टी समझो अब ! तब तक आ आराम फरमा लें !"

Friday, June 13, 2008

" जब भी यह दिल उदास होता है.............."


जब भी यह दिल.............

"जब भी यह दिल उदास होता है ......" सुबह रूचि ने जब जगाया तब FM पर बजता यह गीत मेरे कानो से गुजरा !घड़ी की तरफ़ नज़र फेरी तो ८:२५ हुए थे !
"तुम्हे इंटरव्यू देने नही जाना है क्या ?.... नन्ही रूचि की आवाज़ इस गाने की आवाज में कही गुम हों गई ! कान में सिर्फ़ गुलज़ार के शब्द बस गए थे॥
सच मे गुलज़ार साहब की कलम की अद्भुत करामात है यह!
बेड पर पड़े पड़े एक आम हिन्दी फिल्मी हीरो की तरह " FLASH-BACK" में चला गया...
कोई भी ऐसा पल याद नही आया जब दिल उदास हो और कोई आस पास न हो...... हाँ मगर ये कहना मुश्किल लगा कि उसके आस पास होने से दिल उदास था या दिल के उदास होने से वो आस पास....
वो होस्टल की छत जब माँ को याद कर रोता था या जब रोता था तब माँ की याद आती थी.......
रोज शाम उस सड़क को देखना जो घर की तरफ़ जाती थी... इस इंतिज़ार में कि आज कोई आएगा घर से........
" कोई वादा नही किया लेकिन तेरा इंतिज़ार......."
फिर एक-एक कर न जाने कितने ही मंजर आंखों के सामने से गुजरे .....हर उदासी के वक्त कोई ना को कोई जरुर था भले ही जगह और लोगों के चहरे बदल गए हों !
टहलता हुआ बालकनी मे आया तो कंचे खेलते बच्चो को देख वो अपने कंच्चे याद आए जिन्हें चाचा के डर से आँगन के अमरुद के पेड़ के नीचे छुपा दिया था ........... शायद आज भी वही पड़े मेरा इंतिज़ार कर रहे होंगे....
मोबाइल बज उठा , अलार्म था ९ बजे का ! तौलिये को कंधे पर रख बाथरूम की ओर चल पडा ! आज फिर एक और इंटरव्यू है .... जो भी हो वहाँ मगर दिन तो अच्छा गुजरेगा ही....
यादें हमेशा उदास नही छोड़ जाती और छोड़ भी दे तो क्या "जब भी ये दिल उदास उदास होता है जाने कौन आस पास होता है! "

Thursday, May 15, 2008

अंगूर खट्टे हैं...

पता नही उसे क्या करना चाहिए ? हँसना या रोना अपनी किस्मत पर! एक बार फिर वही कहानी दुहराई गई थी
हमेशा की तरह आज भी उसे पता था किआज का दिन भी बेकार जाएगा ॥ और गया भी..... पता नही क्यो वह हर बार उसके बातों पर यकीं कर लेता है, डायरी के पन्नों को टटोलने से पता चला कि पिछले एक साल में
एक, दो , तीन नही यह ३२ मौका था जब वह वह अपने वादे को पुरा नही कर पाई थी मिल नही पाई ! अगर ओलमपिक मे वादा तोड़ने जैसा कोई खेल होता तो भारत का एक गोल्ड मेडल पक्का था!
दरवाज़े पर हुई दस्तक से वर्तमान मे लौट आया अनूप आगया था, आते ही गाना बजा दिया जग्तित सिंह ग़ालिब की ग़ज़ल गुनगुना रहे थे... तेरे वादे पर जिए हम तो.....................................


Sunday, April 6, 2008

A few lines from my first story............

बहुत खुश थी वो ! इतना खुश कभी नही देखा था उसे, मुस्कुराने लगा निहार मगर दिल था जो बैठा ही जा रहा था.......
"कहते हैं जब प्यार हो जाए तो दुनिया ख़ूबसूरत नज़र आती है, हर पल एक नई खुशियों की सौगात लती है मगर यहाँ तो ..... सब की खुशी मे खुश रहने वाला इन्सान ,जिसके लिए जिंदगी हमेश ही कुछ न कुछ ऐसी सौगात हमेशा ही लाती है जो हमारे लबों पर muskuraahat ला सके..... आज जिससे प्यार करता है उसी के खुशी से दूखी था ! घिन आने लगी थी उसे अपने आप से....... सच मे निहार बदल गया था.... "

"ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली थी, निहार खिड़की से बाहर देख रहा था... बगल की पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन की आवाज़ ने चौका दिया उसे ... जाने कब झपकी लग गई थी ... एक काफ़ी ले फिर से बाहर देखने लगा.... समानांतर गुजरती हुई रेल की पटरियां.... या निहार और निहारिका? शायद ... नही यकीनन ये तो यही दोनों हो सकते थे..... जितने पास उतने ही दूर.... "

"सोच रहा था उसे हमेशा consolation prize यानि सांत्वना पुरस्कार ही क्यो मिलता है..... स्कूल के quize , ..........................and last but not the least the consolation prize go to NIHAR..... nihar dear just work hard u can do better..... प्रतिमा ma'am की आवाज कानों में गूंज गई.... नजाने कितनी बार उसका नाम उस स्टेज से पुकारा गया था!.... ५-६ या बार ... याद ही नही... just work hard n u can do better..... work hard and u can do better.... स्कूल मे नही समझ पाया की कहाँ कमी रही थी और आज जिंदगी मे भी wahi consolation priz... सांत्वना पुरस्कार..... एक पुरस्कार जो हमेशा हरने का एहसास दिलाता रहे..... या एक certificte जो ये बता सके की आप जिंदगी की दौड़ मे पिछड़ गए या आपसे आगे कई लोग निकल गए..... वैसे अभिनव ऐसा नही मानता उसकी माने तो ये certificate ये बताते हैं की आप भी जितने की होड़ मे शामिल थे.... जो भी हो ये बात तो तय है कि consolation prize पाने वाले विजेता नही होते..... मुस्कराहट के अलावा क्या ला सकता था वो चहरे पर..."