Monday, June 16, 2008

अंगूर खट्टे हैं भाग -२

साफ सफ़ाई का दौर जब एक बार जब ख़त्म हुआ तो घर में अब तक मौजूद मेहमान शादी और रिसेप्शन में मिले गिफ्ट्स के पोस्टमार्टम में लग गए...
" भाभी ये क्या मिला है इस पर तो देने वाले ने अपना नाम तक नही लिखा है "
"ऐसा क्या मिला है? " निहारिका भौच्चाकी सी रह गई जब उसने देखा उस गिफ्ट को , कुछ और नही बोल पाई !
"किसने दिया होगा?"
"ये मैं कैसे कह सकती हूँ" अनमने ढंग से जबाब दे अपने कमरे मे चली गई.
"क्या मिला है"...
"एक पेंटिंग है .. देने वाले ने अपना नाम भी नही लिखा है........"
बाहर के कमरे से आती आवाजों से पीछा नही छुडा पाई वह ....
" होगा कोई पागल...." एक आवाज़ फिर गुंजी ..
पागल ही तो था वो... ...तो शादी मे आया था ………………..या किसी से भिजवा दी थी इस पेंटिंग को.. वादे का पुरा पक्का निकला.... निहारिका कहीं गुम होने लगी थी यादों के साये मे...... …और.. कब नींद आई क्या पता उसे... जब आंख खुली तो ... पाया पेंटिंग अभी भी एक "hot topic " थी घर में ......जितने मुह उतने कयास ... किसने... क्यो.......????? हर इन्सान करमचंद या ब्योम्केश बना पड़ा था....
पेड़ से अंगूर के गुच्छे... नीचे ललचाई निगाहों से देखती एक लोमडी.. और कोने men लिखा अंगूर खट्टे हैं..... ! कुल मिला एक बेढंगा और बे मतलब का गिफ्ट! और ऊपर से देने वाले ने अपना नाम तक लिखने की जहमत नही उठाई ... क्या कुछ नही था इसे घर मे एक 'hot topic' बनने के लिए...
दिन ने करवट बदली ....सांझ की दस्तक के साथ ही इन 'खट्टे अंगूरों' को निहारिका के कमरे के सुपुर्द कर दिया गया..... धीरे धीरे सांझ ने भी रात के लिए अपनी जगह छोड़ दी...दिन भर के शोर शराबे के बाद पहली बार एकांत मिला निहारिका को... अनिकेत का कोई अता पता नही था ... बैठा होगा वही नुक्कड़ वाली चाय की दुकान पर ....... चाय वाला और उसकी पसंदीदा संगीत दोनों का कोई जबाव नही.... दिन भर की गर्मी शाम की बूंदा baandi के साथ ही काफूर हो गई थी.. पूर्वा हवा ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था.... "आज मौसम बड़ा बेईमान है ,,,,,,,,,,,," चाय की दुकान पर बजाते गीत की स्वर लहरियाँ कमरे तक आ रही थी... उफ़ चाय के दुकान पर बजने वाले ये फिल्मी गाने... १० साल से ज्यादा हो गए ........ स्कूल जाते वक्त अनिकेत का वहाँ खड़े हो उसे स्कूल जाते देखना ..... स्कूल.... फिर कालेज ... फुर्र हो गए थे वो दिन... सब बदल गया इन १० सालों में ... स्कूल... कालेज .. कब के पीछे छूट गए... लेट गई वह अपने बिस्तर पर ... आँखें कमरे का मुआयना करने लगी..... परदे से लेकर कमरे में लगे रंग तक हर जगह उसके पसंद का ख्याल रखा गया था.....नज़र दौड़ते दौड़ते उस पेंटिंग पर जा टिकी.. पैर अपने आप उधर ही चल पड़े....

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