Wednesday, October 17, 2012

बूढ़ा बस स्टैंड



लड़ाई हुई थी अपनी आँखों की,
पहली मुलाक़ात पर,
वह बूढ़ा सा बस स्टैंड, मुस्कुराया था देख हमें,
जाने कितनी बार मिले थे हम वहाँ,
जाने कितने मिले होंगे वहाँ हम जैसे,
वह शब्दों की पहली जिरह,
या अपने लबों की पहली लड़ाई,
सब देखा था उसने, सब सुना था,
चुपचाप, खामोशी से, बोला कुछ नहीं।
कहा नहीं किसी से, कभी नहीं।
कितनी बार तुम्हारे इंतज़ार में, बैठा घंटों,
जब तुमने आते-2 देर कर दी।
जब कभी नाराज़ हो मुझे छोड़ चली गयी तुम,
कई पहर, उंगली थामे उसकी, गोद में बैठा रहा उसके।
उसके कंधे पर सर रख के।
याद है वहीं कहीं गुमा दिया था तुमने दिल मेरा,
हंसा था मेरी बेबसी पर वह,
अब वह बूढ़ा स्टैंड वहाँ नहीं रहता,
कोई fly over गुजरता है वहाँ से
देखा था, जब आया था तुम्हारे शहर पिछली बार।
कहीं चला गया होगा वह जगह छोड़,
उस बदलाव के उस दौर में, जब सब बदले थे,
मैं, तुम और हमारी दुनियाँ !
अब जो सलामत है वह बस यादें हैं,
और कुछ मुट्ठी गुजरा हुआ कल,
याद आता है वह दिन, जब तुम्हारा दिल रखने को
तुम्हारे नए जूतों की तारीफ की थी, उसी स्टैंड के तले,
तुम्हारे बनावटी गुस्से और उस घूसे का गवाह भी बना था वह,
कहा था तुमने, मेरे दिल की हर बात
चेहरे से बयां होती है,
चुगलखोर चेहरा मेरा, मेरे दिल का हर राज़ खोल देता है।
मुस्कुराया था, वह बूढ़ा स्टैंड, मेरे नाकाम झूठ,
और तुम्हारे बात पर।
क्या होता अगर वह बूढ़ा होता वहाँ आज भी?
गर कभी गुजरते वहाँ से तुम तो जरूर कहता तुमसे,
जाने के बाद भी तुम्हारे, कई बार आया था, तुम्हें ढूँढने को,
जाते-2 कुछ खरोचें छोड़ गए थे दिल पर मेरे,
झाँकती हैं वह खरोचें चेहरे से मेरे,
बयां करती हैं दिल के ख़राशों को,
मुस्कुराऊं मैं तब भी,
चुगलखोर चेहरा मेरा, मेरे दिल का हर राज़ खोल देता है, अब भी।


Wednesday, October 10, 2012

काला दिल



सुबह सबेरे चिपका होता है आसमां से यूं,
ज्यो सोते वक़्त, माथे की वह बड़ी सी लाल बिंदी,
आईने से चिपका देती थी, दादी माँ,
बढ़ता, घटता, बढ़ता है,
मिटता है और आ जाता है,
रंग बदलता रहता है,
सुबह, दोपहर, शाम, क्यो?
जलता-2 रहता है,
पर जलता है क्यो तू?
आसमां में मीलों दूर बैठा,
जलन किस बात की है तुझे?
गुबार किस बात का है तेरे दिल में?
क्या धरती ने दिल तोड़ा था तेरा?
या हमसे जलता है तू?
धनक तेरी देख, सोचता हूँ मैं,
हर वक़्त जलते रहने वाले सूरज,
दिल तेरा कितना काला होगा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!


Wednesday, October 3, 2012

दो रुपये की खुशी



बड़-बड़ ...... बड़-बड़ाता है,
आसमां में देख मुसकुराता है,
इशारे करते रहता है,
अक्सर चलते देखा है, चलता ही रहता है,
और चलते-2 खुद से बतियाता है.....
ऐसा ही है वह.....

कोशिश नहीं दिखती
कुछ बन जाने की,
चाह नहीं कुछ पाने की,
फिक्र नहीं है खाने की
सुध नहीं नहाने की
ऐसा ही है वह....

बढ़ी हुयी दाढ़ी
आधी सफ़ेद आधी काली,
बदहाल कमीज़, बिना बटन के,
चिथड़ों सा पैंट,
एक पैर मे काला, एक में सफ़ेद चप्पल
बिलकुल दाढ़ी की तरह दो रंगी...
ऐसा ही है वह.....

बारिश से बचने को, जब छाता ले निकला था मैं,
उस रोज तो पहली बार देखा था उसे...
उसके अपने छाते के साथ....
छाता?? छाते जैसा ही था कुछ,
बस कपड़े की जगह रस्सियाँ लिपटी थी 2-3 तारों पर....
ऐसा ही है वह.....

पागल है पर समझदार है,
जनता है, उसे कब कहाँ होना चाहिए,
सुबह नुक्कड़ की चाय की दुकान पर,
कोई ना कोई चाय बिस्कुट दे ही देता है,
शाम को पिछली गली मे समोसे की दुकान पर,
वह जानता है, उसे खाने को जरूर मिलेगा और मिलता भी है.....
तो दोपहर में सड़क किनारे के उस कूड़ेदान में,
कभी सूअरों संग कुछ चुनता है, तो कभी उनसे खाना छीनता है,
ऐसा ही है वह.................

दाढ़ी में चावल के दानों को देख लगता है
कल रात खाया था कुछ इसने........
देखता है जब कभी मुझे, मुसकुराता है,
जैसे कोई पुरानी जान पहचान है अपनी,
सामने देख उसे मैं भी मुस्कुरा देता हूँ बे-मन,
ऐसा ही है वह.......

मिला था कल शाम, किराने की दुकान पर,
देख मुझे आदतन मुस्कुराया वह, मैं भी....
उसकी घूरती आँखों को खुद से हटाने के लिए
या अपनी पुरानी मुसकुराती पहचान की खातिर,
दो रुपये का एक बिस्किट का पैकेट खरीद, दे दिया उसे....
मुस्कुराया, खुश हुआ, पागलों की तरह,
नहीं-2 अपने आप की तरह, शायद....
ऐसा ही है वह....

खुश तो यूं हुआ वह, मानो खुदा ने जन्नत दे दी हो....
कोई लाटरी निकली हो...  या फिर.....
पता नहीं ... पता नहीं है मुझे..... पर इतना जनता हूँ...
उसे पैकेट से बिस्किट निकालना आता है   
मुसकुराते, बिस्किट खाते, खुद से बतियाते
वह चला गया.... खुशी-2
किसी मासूम की तरह...
ऐसा ही है वह...

वह चला गया, मुझे एक सोच में डूबा छोड़,
अगर मैं बटोर लूँ सारी खुशियाँ एक साथ,
पा लूँ इस दुनिया को कभी,
क्या तब भी मुझे इस की तरह
यह दो रुपये की खुशी नसीब होगी?
होगी क्या कभी?

Tuesday, October 2, 2012

दायरे


मेरा एक घर है इस महानगर में,
3 कमरे, रसोई घर और एक बड़ा सा हाल,
हर कमरे से जुड़ी एक बालकनी,
जहां से सारा शहर दिखता है,
चाय की चुस्की लेते हुये मैं जब
समंदर को देखता हूँ तो यूं लगता है,
यह लहरें मेरी ऊंचाई तक आने को मचल रही हैं।
बहुत सारे लोगों को जनता हूँ यहाँ
और वो सब यह जानते हैं,
मेरा घर उनके घर से बड़ा है बहुत बड़ा......
साल के किसी कोने में छुपी हुई छुट्टियाँ चुरा,
माँ को ले कर, माँ के घर जाता हूँ
शायद अपने पुराने घर।
घर बड़ा ही छोटा सा है,
बुढ़ापे की लकीरें उसके चेहरे पर साफ-2
नज़र आती हैं,
रहता तो वहाँ कोई नहीं है अब,
मगर माँ कहती है यादें बसती हैं कुछ वहाँ,
जिन्हे सजोने वह हर साल आती है,
मेरा अपना एक कमरा भी है
जिसमे कोई खिड़की नहीं है कोई,
बस एक रोशनदान है।
जहां से बाहर कुछ भी नहीं दिखता है,
मगर सुबह सबेरे सूरज की किरण
मेरे बिस्तर तक आती है।
माँ बड़े चाव से बताती है बचपन में
मैं इन किरणों को मुट्ठी मे बांध लेता था....
डर के, कहीं मुझे छोड़ ना जाएँ यह.....
एक आँगन भी है इस घर में,
पास के पीपल के पत्ते यहाँ घर कर लेते हैं,
हवा धूल उड़ती है दरवाजे पर,
जिससे माँ को मिट्टी की खुशबू आती है,
और मुझे छिंक!
छुट्टी के सात दिनों में से, दो आने जाने में,
दो घर की सफाई में, बाक़ी बचे तीन घर के मरम्मत में!
फिर ......
फिर मैं लौट आता हूँ, महानगर के अपने उसी बड़े से घर में
दशा अजीब सी होती है मेरी, वापस आ,
मेरे बड़े से इस घर का दायरे सिमटे-2 से नज़र आते हैं,
यह बड़ा सा घर हर बार पिछली बार से कुछ छोटा दिखता है।
माँ तो कुछ नहीं बोलती, पर उसकी आँखों में कुछ ऐसा सा ही दिखता है।
हर साल कुछ ऐसा ही होता है....
अपने गाँव के छोटे से घर वापस आया हूँ माँ के साथ,
हर साल की तरह इस साल भी।
यह छोटा सा घर पहले से कुछ बड़ा सा दिखने लगा है।
हर बार की तरह।
डरता हूँ अब महानगर के उस बड़े से घर लौटने से,
सोचता हूँ लौट कहीं दम ही न घूट न जाए मेरा!