Friday, March 19, 2010

नीयत और नियति

अब भी देखता हूँ
तुझे अपनी नियति से लड़ते हुए।
तू तब भी लड़ती थी,
बचपन से अब तक............
तुझे लड़ते ही पाया है,
हालात से, जज्बात से, कभी ख्यालात से
डरती नहीं है तू
मुंह मोड़ती नहीं है तू....

हर वीरान सफ़र पर अकेली ही निकलती थी।
शायद कोई उम्मीद होगी, लोग आएंगे
और कारवां बनेगा!
न कोई आया कभी, नाहीं
बना कोई कारवां ...
फिर भी थकते नहीं देखा तुझे।
फिर भी ना रुकी कभी तू
अपनी नियति के आगे कभी झुकी नहीं तू..
तेरी ये अनंत यात्रा अनवरत जारी है,
जानता हूं तेरी नियत तेरी नियति पे भारी है।

कहती थी तू "भाई, मुझे जीतते रहना होगा.. लड़की हूँ ना!
एक बार हारी तो हारते रहना होगा.... "
सच कहती थी .. बस एक बार हारी थी,
फिर हारी थी बार बार!
खो सी गई फिर कहीं तू.....
माँ के कंधे पर सर रख सोते देखा कई बार,
हार के तकिये को भिगोते देखा कई बार।


आज बरसों बाद तुझे फिर से लड़ते हुए
देखा।
वो जीतने का ज़ज्बा वो जिद,
उन्हें फिर से तेरी गोद में अंगड़ाई लेते हुए देखा।
कुछ ख्वाबों को तेरी आँखों में फिर से पलते हुए देखा,
कुछ आधी अधूरी ख्वाहिशों को तेरी पलकों पर जलते हुए देखा।

तू
जीतेगी फिर से
एक कशिश, एक अपनापन था तेरी बातों में
अब भी है।
तुझमे अपनी हार को जीत में बदलने का पागलपन था
अब भी है।
फिर भी एक एक सूना पन था तेरी उन आँखों में
अब भी है।

न तू बदली, नहीं तेरे हालात
न ही तेरे ख्वाब बदले नहीं ख्यालात।
तू न तब हारी थी न अब हारी है
जानता हूँ, तू तब भी जीती थी, अब भी जीतेगी...
तेरा हौसला,तेरे हालात पर भारी है।
अपनी हार को जीत में बदलने की जंग, बदस्तूर जारी है,
तेरी नीयत, तेरी नियति पर भारी है।