Tuesday, November 30, 2010

चाय गिरा एक पन्ना...



ऑफिस में बैठे बैठे कुछ वक़्त मिल गया... या यूँ कहूँ तो मैंने कुछ वक़्त चुरा लिया...कुछ लिखने की सोची.... घन्टों लम्बी मत्थापच्ची .. भीर कुछ नहीं समझ आया... लगा लेखनी पर धूल जम आई है.. देखा तो पाया धूल तो मेरी टेबल पर भी जम गई थी..कम ही पलट कर देखता हूँ ना पलट कर टेबल पर बिखरे पन्नों को... लोग भी कहते हैं रहने दो.. इसे देख writer वाली feel आती है... तो ऐसे ही छोड़ देता हूँ.. ज़िन्दगी की तरह पन्ने ही  बिखरे हों तो कागज़ के पन्नो के बिखरने से फर्क ही क्या पड़ता है.... पर आज का दिन कुछ और ही था... आज धूल को जाना ही था.... एक-२ कर ... परत-दर-परत धूल हटता गया... टेबल पर बिखरे स्क्रिप्ट्स के बिच एक पन्ना हाथ लग गया...देख चेहरे पर मुस्कान बिखर गई.... सफाई छोड़... पन्ने की खूबसूरती में खो गया...
 चाय गिरी थी ना तुमने उस दिन... टेबल पर... शायद ये भी उस सुनामी की चपेट में आ गया होगा... याद हैं ना उस रोज वो कांच का कप कैसे तुम्हारे हाथों में आते ही कैसे अस्तित्व हीन हो बैठा .. मेरी ही तरह... और.......
 वो पन्ना बड़ा ही खुबसूरत लगा ..Biased हूँ ना...... शायद obsession है .... तुम्हारी हर चीज ही खुबसूरत जो लगाती है मुझे... आदत जो हो गई है तुम्हारी..... पन्ने पर छलक आई चाय अपने होने का निशाँ छोड़ गई है.... कभी तुम्हारी हथेली पर लिखना अच्छा लगता था ... आज तुम्हारे पन्ने पर लिखने बैठा हूं...यूँ ही... निरर्थक ...
 वैसे आज मेरे स्वीट नवम्बर का आखिरी दिन है....शायद ये आखिरी नवम्बर भी हो तुम्हारे साथ ...... अगला नवम्बर आयेगा इसमे तो कोई दो राय नहीं .... तुम्हारी भी ज़िन्दगी में.... मेरी भी ज़िन्दगी में..... पर तब तक इसके मायने अलग ही होंगे .... दोनों के लिए..... बिलकुल अलग.... आखिर अब हमारे रस्ते जो जुदा ठहरे.... मैं जनता हूँ मैं अगले नवम्बर में कहाँ होऊंगा ... पर तुमवो तो अभी तुम्हे भी नहीं पता....पर यह बात लिखते लिखते मैं एक स्टार बना रहा हूँ... तुम्हारी तरह... जो तुम अपनी हर बात पूरी कर कहते थे Terms & Conditions...
 नवम्बर तुम्हारी भाषा में 'My Fruitful November' अब बस कुछ ही घंटों का ही मेहमान है... पलट कर कितना भी देख लूँ .. लौट कर नहीं आयेगा...शायद तुम्हारी तरह.... तुम्हारा कहना गलत नहीं है... नवम्बर Fruitful  तो हमेशा ही रहा है मेरे लिए... इस बार मुझे खाली हाँथ छोड़ कैसे जाता.... इस बार मुझे जितना दे कर जा रहा है उतना तो कभी नहीं दिया...शायद उम्मीद से बहुत ज्यादा.... ...कुछ पा कर तो सभी खुश होते हैं...आज हम दोनों ही खुश है ना....  तुम कुछ पा कर बहुत खुश हो... और मैं... हूँ ना.. कुछ गवां  पहली बार ख़ुशी मिली है.... एक अभूतपूर्व आनंद.... नवम्बर की यह आखिरी शाम एक मुस्कराहट भेट कर जाना चाहती थी..... सो दिया भी ....
अब मुझे अगले नवम्बर का इन्तिज़ार है... शायद तुम्हे भी हो..... कम से कम ये तो जरुर जानना चाहोगे ना कि अगला नवम्बर क्या सौगात लायेगा मेरे लिए...वैसे तुमसे बिना पूछे .. एक टूटी, बंद पड़ी घडी.. जिसके बंद होते ही मेरे लिए वक़्त वही ठहर गया था ..और तुम आगे निकल गए थे.. बहुत आगे.. मेरी पहुँच से दूर...., एक इयर फोन, एक mp३ प्लयेर.. कुछ फिल्मो के टिकट  जो हमने साथ देखे थे कभी... कुछ एक नवम्बर, अनगिनत सुखद-दुखद यादें..कुछ पल... और ये चाय गिरा पन्ना चुरा कर पास रख लिया है..... जो शायद तुम्हारे किसी काम न आयें... पर मेरे लिए इनके मायने .... तुम्हारे समझ से परे हैं... 
वैसे तुम बातों को जल्दी भूल जाते हो... पर यादों के दरीचों के बीच कोई ऐसी लकीर जरुर होगी जो मैंने उकेरी होगी.... याद करना .... बुरा नहीं लगेगा....
Terms & Conditions...
एक पागल 
     

Saturday, November 27, 2010

जलते हुए सिग्रेट की आवाज़

कभी जलते हुए सिग्रेट की आवाज़
सुनी है तुमने?
एक अजीब सी आवाज़,
सन्नाटे को भेदती..
मानो उसे मिले हर ज़ख्म
का हिसाब मांगती हो...
कितनी मिलती है ना
उसकी आवाज़ मेरे दिल की आवाज़ से....?
सुन अपनापन सा लगता है.
वही चीर-परिचित सदायें,
वहीँ धुआ-२ सा माहौल..
कभी सुनना इस व्यथा को तुम,
मेरे दिल की सदाओं जैसी ही लगेंगीं,
आखिर दोनों एक ही तो हैं..
जनता हूँ, सुन कर यहीं सोचोगे
कि तुमने कौनसे ज़ख्म दिए हैं मुझे?
मैं भी सिग्रेट जला यही सोचता हूँ..
इसके सवाल बेमानी से लगते है...
मगर जलन उसका क्या?
मेरी और सिग्रेट की फितरत
लगभग एक सी हैं..
बस फर्क इतना भर ही है
सिग्रेट जलाते जलते बुझ जाती है..
और मैं बुझते-२ जल जाता हूँ...
एक जल कर भस्म  हो जाता है
और एक......
जितना बुझाओ
उतनी ही शिद्दत से जलाता है....
एक बार जरुर जलाना सिग्रेट..
शायद बुझने से पहले
ये उन सवालों को पूछ बैठे ..
जो मैं जीते-जी, कभी ना पूछ पाऊं...
एक कश जरुर लेना... शायद..
सिग्रेट की आत्मा को शान्ति मिले..
बुझने से पहले वो
उन होठों  को छू कर गुजरे..
जिनसे अब मेरा नाम ...
बमुश्किल ही निकलता हो....

Thursday, November 25, 2010

इधर-उधर से.....

१) ख्वाबों के बोझ से कुचले 
आसमां में उडान का सबब
धरती पर गिरा वो लहूलुहान परिंदा बता गया...

२) उसे कोई त्याग की प्रतिमूर्ति कहता था,
कोई महान, तो कोई देवी... सुना है वो कल रात 
गुज़र गई, पर जीते जी किसी ने उसे इन्सान नहीं समझा....

३) याद है  उस रात तुमने मेरे तकिये के नीचे
कुछ अध् खिले सपने छिपाए थे, सुबह जब
आँख खुली तो उनकी खुशबू से मेरा कमरा महका हुआ था...

४) जब भी तुम घर आये, तुम्हारे चहरे को
डायरी में दर्ज किया, आज डायरी के पन्ने 
पलटे तो देखा तुम्हारा सुर्ख चेहरा ज़र्द पड़ा था....

५) तुम तो कुछ भी नहीं भूलते थे ना..
कल सामने से यूँ निकले जैसे कभी देखा न हो,
शायद यादों के दरख़्त पर धूल जम आई होगी....

६) उस चहरे से मासूमियत झलकती थी,
कल देखा तो उस पर अनगिनत खरोंचे थीं,
हवाएं जहाँ से गुजरती है अपने निशां छोड़ जाती हैं...

७) उस अछूत के घर रोशनी कम ही आती थी 
पर कुछ दिनों से उसका घर गुलज़ार है,
सुना है, सरकार  ने सूरज की रोशनी पर भी 'कोटा' लगा दिया है...... 

Tuesday, November 9, 2010

हाशिये

खुद के लघुता का एहसास कराते,
ढलते सूरज के साथ बढ़ाते ये साये,
शाम के साथ जवां होती तन्हाई,
भूली बिसरी यादें, धुआं-२ , 
उलझे- उलझे रास्ते अनेक .
जज्बात ... मटियामेट....

मुड के जाने के रास्ते बंद,
मलाल हजारों, खुशियाँ चंद,
कुंद, एहसासों का बगीचा,
उस परी का सूना दरीचा,
खुद को दिए अनंत आघात,
वक़्त का कुठाराघात..

रिश्ते-नाते,अनकही सी बातें,
आधी-अधूरी, अधजगी सी रातें, 
डायरी मे बंद कुछ रुबाइयाँ,
मुझ पर हंसती वो परछाइयाँ ,
वो अनगिनत से आक्षेप,
कुछ हसीं से सपने.. पटाक्षेप.... 

Saturday, November 6, 2010

रतजगे

अंगने में एक सपना खिला है,
आज मैं खुश हूँ,
दूर कहीं वो जूही की 
कलि मुस्काई होगी..

छिटकी होगी चांदनी छत पे
चाँद को देखा होगा 'उसने'
शर्माया होगा चाँद ,
उसे छुपाने कोई बदरिया आई होगी.

हवा ने कुछ कहा होगा,
हौले से उस रुख को छुआ होगा 
बिखर गयी होगी लाली उसके चहरे पर,
शर्मा कर उसने अपनी पलकें झुकाई होगी..

खोला होगा उसने
जुल्फों को अपनी
चाँदी सी इस रात में 
अंधियारी घिर आई होगी..

अब महक उठा है 
मेरा कमर मोगरे जैसा
चहका सा है मंजर 
शायद  उसकी चुनरिया लहराई होगी...

सुनता हूँ सायों की बातें मैं 
अल्ह्हड़, शोख, चंचल, इठलाता 
इतराता गुजरा है एक साया घर से 
शायद उसकी परछाई होगी...

जमा किया होगा उसने 
खामोश गुफ्तगू के परतों को,
सितारों से भरी महफ़िल में
बिखरी एक तन्हाई होगी.

झांकते होंगे एक दुसरे की आँखों
में बेहिस, अधूरी होंगी बातें,
रात अभी गयी भी न होगी 
कि भोर आई होगी .........

Monday, November 1, 2010

एक और नवम्बर

नवम्बर का महीना था वो, शायद २३-२४ नवम्बर, जब चाणक्य सिनेमा की टिकट खिड़की पे देखा था तुम्हे. मेरी हताश-निराश,खानाबदोश सी ज़िन्दगी में तुम यूँ आए थे,  मानो सहरा में बरसों बाद बारिश ने दस्तक दे दी हो, बे ख्वाब, बे मकसद भटकती ज़िन्दगी को एक ख्वाब, एक मकसद मिल गया, सारी ख्वाहिशें, हर आरजू , हर एक जूस्तजू सिमट तुम्हारी बाहों मे आ गए थे. अपनी आँखों के सपनो को तुम्हारी आँखों में सजते देख रहा था, मेरी आँखों में दफन हर  एक सपना अंगडाई लेने लगा था, हर सूखी शाख पर फिर से कोपलें निकलने लगीं, एक लम्बे पतझड़  के बाद बहार ने दस्तक दी थी. 

नासमझ सा, बरसों का भूखा टूट पड़ा था इन खुशियों पर....हर पल में कई जिंदगिया जी रहा था, इस बात से बेखबर... की तुम्हार दम सा घुट जायेगा ... दम सा घुटने लगा था तुम्हारा.. भूल बैठा था मेरे सपनो के आशियाने में मेरी गोल्ड -फिश के सपने कहीं न कहीं दफन हो रहे होंगें. एक दिन तुमने खुद को Cleopatra  कहा. हैरान परेशां तुम्हारे चेहरे को देखता रहा, 'पागल..' बस इतना कह पाया था तब .... Cleopatra  वो तो मेरे जैसी रही होगी.... अपनी हठ-धर्मिता, स्वार्थ में अँधा... हर जगह गुबार फैलाने वाला.......खामोश था..... कैसे समझाता कि जिसके पहलु में कई जिन्दगानिया किलकारियां मारती हों.... जिसके साथ गुजरा हर एक पल ज़िन्दगी की किसी भी ख़ुशी से बड़ा हो, उसके साथ गुज़ारा हर लम्हा एक नयी सौगात जैसा हो...जिससे ज़िन्दगी भी जीने का हूनर मांगती हो  वो Cleopatra  कैसे हो सकती है..... 

  आपनो के दिल को दुखाने का काम तो मेरा है... डिसास्टर फैलाना तो मेरा  काम है. .... तू ऐसा कैसे कर पायेगी..... Cleopatra  .. मुस्कुराया था ...... पगली है ये लड़की यही सोचा..... उस दिन AIIMS के फ्लाई-ओवर के निचे बैठे थे न हम.. कंधे पे मेरे सर रख कहा था तुमने..." मैं तुम्हारे जैसा बनाना चाहती हूँ..... मुझे भी 'निहार' बनाना है..." बस खामोश था... आँखें नम हो आई थी.... 
कैसे समझाता 'निहार' होने का मतलब तुम्हें... 
'निहार' बन के क्या मिलेगा तुम्हे.... पगली....कुछ कहे, कुछ अनकहे सवाल.... दिल दुखाने की एक लम्बी फेरहिस्त ... नींद से लूका-छिपी खेलती रातें.... बेचैन-बेहाल , बदहवास रातें.... या फिर मीलों लम्बी मलाल......
'निहार' तुझे कैसे बताता वो खुद तुम जैसा होना चाहता है .... वो खुद एक गोल्ड फिश बनाना चाहता था... तुम जैसा ... बिलकुल तुम्हारे जैसा........
 उस दिन के बाद तुमसे दूर होना चाहता था.. दर सा गया था... नहीं चाहता था मेरा साया भी तुम्हे छू कर गुज़रे .... कहते हैं न की काज़ल की कोठारी में कितना भी बच के जाओ कही न कही कालिख लग ही जाती है... नहीं चाहता था तेरी ज़िन्दगी में एक बुरे सपने की तरह आऊं.... तुम्हारी अच्छाइयों से घबरा सा गया था.. जनता था एक दिन ये दिवा स्वप्नं जरूर टूटेगा... शायद  उन टूटे सपनो को फिर से देखने की हिम्मत न कर पाओ... तुम... शायद मैं खुद भी....... 

काश उन दिनों तुमसे दूर कर गया होता...... स्वार्थी मन बार बार तुम्हारी ओर ले जाता रहा.... खुद को रोकने की कोशिश की थी.... मगर शायद कमी सी रह गयी थी कहीं......  अपनी उठेद-बुन में गुम.. तुम्हारे और करीब आते गया.  ..एक छोटे से बच्चे की तरह दबोच तुम्हे सिने से लगा लिया था.....जान-बूझ के या अनजाने में .., भूल गया  हथेलियों में कैद चिडिया छटपटा रही है... दम घुट रहा है उसका....

" तुम बहुत नेगेटिव सोचते हो.... Be an optimist....किसी भी सपने को पाने के लिए एक उमीद किजरुरत होती है... उम्मीद मत हारना..... किस्मत   भी उनका साथ देती है जो आपना साथ देते हैं........".. तुम्हारी इन्ही बातों  से नाउम्मीदी के बवर में पड़े एक शख्स कौम्म्दी की किरण मिल गयी..... अब उम्मीद  का दामन थाम्हे आशावादी हो रहा था....बस यही न समझ पाया की कहाँ उमीद करना है कहाँ नहीं.... जाने बिना हर जगा एक उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी...... जनता था कैसे भी मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ... फिर भी तुम्हे पाने की हसरत इन्ही दिनों जवान हुयी थी.....

 तू सच में पागल थी.. किसे सुधार रही थी .... एक-२ कर नाजेने कितनी बार दिल दुखाया होगा ... अब तो मुझे भी यद् नहीं तुझसे के पुछूं ........ हर गलती के बाद एक  SORRY....  अब ये शब्द भी बेमानी हो चला है.... कोई मतलब नहीं रह गया है....
तुम अपनी जगह सही हो..... कुछ हद तक मैं भी........ मगर क्या फर्क पड़ता है सही कोई भी हो.. तकलीफ तो होनी ही है तुम्हे हो मुझे हो.. हमारे अपनों को......ऐसा नहीं की मैंने को कोशिश नहीं की, फासले मिटने की हर कोशिश ने फसलों को और बढाया है.... जनता था मेरा स्वार्थ मुझे इस मुकाम पे लायेगा एक दिन...... मगर इतनी जल्दी.... ये सोचा न था.... हथेली में रेत को भिचने चला था ... रेत को निकलना ही था.... बढ़ते दूरियों के एहसास भर से एक-एक कर दिल हर अरमान धराशाही होने लगे हैं... तुम जा रहे हो दूर या मैं तुम्हे खुद से दूर करता जा रहा हूँ.... जो भी है..... कल भी ऐतबार था आज भी है और रहेगा भी... तुम्हारे फैसलों पे... जनता हूँ जो भी करोगे सही ही होगा...आपनो को दूर जाते देखना बहुत ही दुखदायी होता है.... तुम खुद को अलग कर रहे हो मुझसे ये फैसला आसान नहीं रहा होगा..... अगर तुम इस फैसले पे ए हो तो वजह जरुर होगी...... नहीं तो तुम ऐसा कभी नहीं करते....
         
याद है उस रात अपनी आँखों से निकल कुछ सपने दिए थे...कहा था संभल लेना.. मेरे पास मेरा अपना बस यही है.... संभल के रखना उन्हें...... गुजारिश है तुमसे... वो अपने तकिये के नीच कुछ सपनो कैद किया था तुमने..... किया था न तुमने? कभी फुर्सत मिले तो देखना कोई तो ऐसा सपना होगा जो तुम्हारे सपने से मेल खाता होगा.... कोई न कोई जगह जरुर होगी जहाँ हमरे सपने मिलते होंगें....... या मेरा कोई सपना जो तुम्हारा होगा.. या तुम्हारा कोई सपना मेरा होगा..... ..वक़्त के किसी मुकाम पे इन सपनो की मुलाकत जरुर होगी... इतनी गुंजाईश जरुर रखना की इन अधखिले , आधे अधूरे सपनो को जीने का मौका मिले...... जनता हूँ ये मुश्किल है  की तुम्हारे किसी सपने में मेरी कोई जगह हो..... कही हो तो बताना जरुर.....

उस रात जब तुम जा रहे थे नाराज़ हो.. धुंध से बहरे उस वीरान सुनसान सड़क पे ... स्ट्रीट lights ऐसी लग रही थी मानो हवा में अलाव जला रखा हो किसीने... एक अलाव तो मेरे सिने में भी दफन थी... रोशनी पे धुंध जयादा हावी थी उस रात....  आँसू के हर कतरे ने सिफारिश की तुम्हारी, कहा रोक लो .... हाँथ बढाया भी... मगर गुनाहों से भोझिल , मेरे कापते लबो से कोई आवाज न आई..
  तुम्हे जाते हुए देख रहा था.... तुम्हारे पैरों के निचे आये हर पत्ते ने दस्तक सी दी थी मेरे सिने में... धुंध ने धीरे-२ तुम्हे लपेट लिया था.. साया भी गुम गया कही... कदमो की आहात भी नहीं आ रही थाई... फिर भी वही खडा था... बहुत देर तक...

   एक उम्मीद, एक विश्वाश , एक आस यही दिया है तुमने..... बुबरा कभी भी ना उम्मींद  न होने के वादे पे अभी कायम हूँ .. उम्मीद है तुम्हारी... तुम्हारे वापस आने की ... विश्वाश है खुद को संभाल पाने की... आस तो ... तुम हो ना....

यह भी एक नवम्बर है... कितना अलग उस नवम्बर से ... मगर मेरे हालात अलग नहीं हैं... बस लोग चेहरे अलग हैं.. गुनेह्गर हूँ..... अपनी इस हालात का खुद ही जिम्मेदार हूँ.....  मगर वादा  रहा इस  हाल  में ना तुम्हे रहने दूंगा  .. और ना ही खुद  को कभी पाउँगा....
पिछली बार जब आये थे, मुस्कुराते हुए.. गुलमोहर की तरह..... ज़िन्दगी में मेरे.... उम्मीद है फिर से आओगे..... पिछली बार मिले थे तो कद्र नहीं कर पाया था.... तुम्हारी पहचान नहीं कर सका.... हीरे की परख तो परखी कर सकता है.. मैं एक आम सा आदमी...गवां बैठा तुम्हे......अबकी बार ऐसा नहीं होगा......

माफ़ी के लायक तो नहीं हूँ मगर कर देना अगर संभव हुआ तो......

तुम थे तो सब था ...... नहीं हो तो कुछ भी नहीं.......दिल की हर धड़कन कहती है... " दोस्त आजाओ या बुला लो....... "
मैं अभी वही खडा हूँ तुम्हारे इन्तिज़ार में......
तम्हारा 
'निहार'