Tuesday, November 9, 2010

हाशिये

खुद के लघुता का एहसास कराते,
ढलते सूरज के साथ बढ़ाते ये साये,
शाम के साथ जवां होती तन्हाई,
भूली बिसरी यादें, धुआं-२ , 
उलझे- उलझे रास्ते अनेक .
जज्बात ... मटियामेट....

मुड के जाने के रास्ते बंद,
मलाल हजारों, खुशियाँ चंद,
कुंद, एहसासों का बगीचा,
उस परी का सूना दरीचा,
खुद को दिए अनंत आघात,
वक़्त का कुठाराघात..

रिश्ते-नाते,अनकही सी बातें,
आधी-अधूरी, अधजगी सी रातें, 
डायरी मे बंद कुछ रुबाइयाँ,
मुझ पर हंसती वो परछाइयाँ ,
वो अनगिनत से आक्षेप,
कुछ हसीं से सपने.. पटाक्षेप.... 

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