Thursday, May 15, 2008

अंगूर खट्टे हैं...

पता नही उसे क्या करना चाहिए ? हँसना या रोना अपनी किस्मत पर! एक बार फिर वही कहानी दुहराई गई थी
हमेशा की तरह आज भी उसे पता था किआज का दिन भी बेकार जाएगा ॥ और गया भी..... पता नही क्यो वह हर बार उसके बातों पर यकीं कर लेता है, डायरी के पन्नों को टटोलने से पता चला कि पिछले एक साल में
एक, दो , तीन नही यह ३२ मौका था जब वह वह अपने वादे को पुरा नही कर पाई थी मिल नही पाई ! अगर ओलमपिक मे वादा तोड़ने जैसा कोई खेल होता तो भारत का एक गोल्ड मेडल पक्का था!
दरवाज़े पर हुई दस्तक से वर्तमान मे लौट आया अनूप आगया था, आते ही गाना बजा दिया जग्तित सिंह ग़ालिब की ग़ज़ल गुनगुना रहे थे... तेरे वादे पर जिए हम तो.....................................