Friday, December 31, 2010

साल का आखिर सच...

स्याह रात ने अपने पर फैला दिए थे .... साये गहरे होते जा रहे थे.... वो तड़प रहा था... सितारों ने बेड़ियों से जकड़ लिया था उसे....... आवारा उल्कायों ने पहले उसे दोस्ती के जाल  में फसाया और फिर जाते जाते उसे दाग दे कर चली गयीं ... अनगिनत दाग...उसके चहरे पर वो धब्बे साफ साफ नज़र आ रहे थे.... आवारा उल्काओं से उसकी दोस्ती धरती को पसंद नहीं आई थी शायद ... अब धरती की परछाई 'चाँद' को निगल रही थी... उसका अस्तित्व ख़त्म हो रहा था.... चांदनी का भी दम घुटा सा जा रहा होगा ... तभी तो उसकी रंगत पिली पड़ती जा रही थी.. चाँद की हमदर्द चांदनी ने भी शायद उससे दूर जाने का फैसला कर लिया था.... निसहाय सा चाँद उसे बस जाते हुए देख रहा था.... वो अपना हाँथ बढ़ा चांदनी की कलाई थाम लेना चाहता था..... पर उसके हाँथ तो उठे ही नहीं.... गुनाहों के बोझ तले दबे जो थे.... और बेरहम चांदनी? उसने तो पलट कर देखना भी गवारा न समझा...... चाँद की आँखे भर आई... उसकी आँखों से खून टपक रहा था...टप- टप... टप.. कर खून का हर एक कतरा मेरे लिहाफ को भिगोता रहा.... छत पर खड़ा मैं चाँद की इस दुर्गति का मूक दर्शक भर था..... चाँद की लौ फडफडा रही थी... शायद बुझने से पहले उसकी  आखिरी कोशिश होगी ... दम घुटने सा लगा .. हांफने की आवाज़ कानों में गूंज रही थी.. माथे पर हाथ फेरा तो हाथ चिपक कर रह गया.....चीखना चाहता था पर गले आवाज़ नहीं निकल रही थी....
हाँथ बढ़ा चांदनी को पकड़ लेना चाहता था.. बतलाना चाहता था , चाँद के लिए उसके मायने.... पर मेरे भी हाथ आगे नहीं बढ़ रहे थे.. वो तो हिलने तक को तैयार न थे.... मेरा हल भी चाँद जैसा ही था कुछ...एक झटके से मेरी ऑंखें खुल गयीं.. घबरा कर चारो तरफ देखा तो पाया अँधेरा ही अँधेरा था... दौड़ते हुए बालकनी में पहुंचा..... चाँद एक झुरमुट के पीछे छुपा मुस्कुरा रहा था... सपना देखा था मैंने.. अपने होश संभालते ही मैंने राहत की साँस ली.. 
मैं चाँद की आँखों में आँखें डाली.. उसने मेरी आँखों में झाँका... मैं मुस्कुराया और वो हंसा.... बोला मुझसे चाँद मेरा... पगले जलना बुझाना तो मेरी नियति है.... इससे डर कैसा....न धरती मुझे बुझा-बुझा कर थकती है और न मैं जलते जलते.... अँधेरे में तो सूरज भी रास्ता भटक जाता है.. मैं तो चाँद हूँ.. मेरे पास अपनी रोशनी कहाँ...? ना जाने कौन किसकी बेबसी पर हस रहा था, पर दोनों के चहरे पर एक मुस्कराहट जरुर थी ....और दोनों ही के आँखों में नींद का कोई अता-पता नहीं था..
नज़रें घुमाई तो देखा 'भोर का तारा' हम दोनों को देख मुस्कुरा रहा था.... अरे शाम ही को तो उसने संध्या के आगमन की सूचना दी थी और अब ? रैना की विदाई की तयारी में है? वक़्त कितनी जल्दी बदल जाता है न.... 
एक बार फिर चाँद को देखा... चाँद मुस्कुराया और बोला... तुझे क्या पता कब तेरी ज़िन्दगी में संध्या का कोई सितारा, भोर का तारा बन बैठे....मैं मुस्कुराया... टिक टिक की आवजा मुझे कमरे में बुला रही थी..  कमरे में आ, घडी की आँखों में झाँका तो पाया कि पांच बजने को हैं......आज इस साल का आखिरी दिन है... सोच ही रहा था कि एक ख्याल आया... आखिर 'new year resolution ' भी तो चीज है.... सोचंते लगा.... चाँद अब भी खिसकी से झांक रहा था.. उसे देखा और मैं मुस्कुराया ... मुझे एक नया new year resolution जो मिल गया था.... 
अबकी बार मुझे चाँद बनाना है..... कोई लाख बुझा बुझा के थक जाये ... मेरी लौ जलनी चाहिए... चाँद की  तरह..... हमेशा..... 

Saturday, December 18, 2010

चेहरे



वो आइना अपना सा लगता था मुझे,
आखिर उसी में तो एक चेहरा दिखता था
जो जनता था मुझे,
पहचानता था मुझे...
एक रोज हवा का एक झोका 
उसकी बुनियाद हिला गया,
उसके अस्तित्व, उसके 
अरमानो को मिटा गया.
कराहता मिला था फर्श पर मुझे,
उठाया, देखा, और पाया,
कितना झूठा था मेरा आइना
ता-उम्र मुझे एक झूठा चेहरा दिखाता रहा,
मेरी वास्तविकता मुझसे ही छुपाता रहा,
उसके को सच मन मैं बरसों इतराता रहा..
पर जाते-२ वो मुझे मेरी हकीक़त बता गया,
मुझे मेरे अनगिनत चेहरा दिखा गया,
चेहरे पर पहने थे कई चेहरे मैंने
वो सब  से रु-ब-रु करा गया...
वो टूट गया,
अपना सा लगाने वाला 
वो चेहरा मुझसे रूठ गया..
फिर आइने का सामना कम ही कर पता था,
दिखाता था जिधर उधर जाने से कतराता था,
खुद से नज़ारे मिलाने में ये शर्म कैसी?
और क्यों?
क्या मैंने गुनाह किया है?
क्या मैंने सिर्फ झूठ को जिया है?
नहीं,, तो फिर दर्पण से ये डर कैसा?
सोच यह, कर हौसला बरसों बाद.
आँखों के सामने से गुजरे 
अपने ही चेहरे को कर के याद..
आज आइने से टकरा गया
अपने नए नवेले अनोखे चेहरे 
को देख घबरा गया..
खुछ खो सा गया था चेहरे से मेरे
अपने ही चेहरे में एक कमी सी दिखी
आँखों में हताश से खुछ सपने थे,पर थी
 लबों पर एक मुस्कान की रेखा खिची 
अपनी ही मुस्कराहट इतनी अजनबी  कैसे?
सालों से हूँ अनजान अपनी ही हसी से जैसे...
दिमाग की पहचान तो मुखौटो से बहुत पुरानी है,
मगर दिल के लिए ये तस्वीरे अब तक अनजानी हैं,
माँ के सामने का एक चेहरा
लोगों को दिखाने का चेहरा
एक सुबह का
एक शाम का
कभी तन्हाई वाला 
कभी रुसवाई वाला 
और न जाने कितने चेहरे हैं मेरे
भूल सा गया हूँ अपनी पुरानी छवि को
इन सभी चेहरों में असली कौन नकली कौन?
मैं नहीं जनता...
मेरा दिल इन चेहरों में से किसी भी चेहरे को
अपना नहीं मानता है...

Thursday, December 2, 2010

असुर



सौहार्द, अहलाद,
आनंद परित्यक्त 
देवत्व की राह चुनी 
त्याग पुरुषत्व 

भावनाओं के खँडहर पर 
खड़ा, लाचार बेबस 
मानव हो देवत्व की राह क्यों?
जिस पथ पर तू चल नहीं सकता 
उस पथ की चाह क्यों?

पथिक तू क्यों है
निर्बल, एकाकी, अधीर?
काँटों का ताज तुने ही चुना..
क्यों घबराता है तम से अब 
भ्रम का मकडजाल तुने ही बुना..

लक्ष्य से विचलित, विमुख मानव 
तू जीवन के ज्वलंत ज्वार में खो गया है,
ज़िन्दगी की ताल से खो कर सुर
अब तू न मानव रहा,न देव है
तू एक असुर हो गया है.....