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संदेश

वो (भाग-2)

( मेरे प्यारे से दोस्त गोल्ड फिश को समर्पित ) रात - दिन ताना- बाना बुनती रहती है वो फिर उलझाती है खुद को उन्ही तानों में, मथती रहती न जाने क्या हरदम, गुम हो अपने ही ख्यालों में , बल पड़ते हैं सोच-२ उसके पेशानी पर। समझ न पाई है रिश्तों के भ्रम - जाल को खीजती है कभी , रोती है कभी , कभी गुमसुम , तो कभी हँस लेती है, रिश्तों को निभाने में दिखलाई अपनी नादानी पर । ढका है रूह अनगिनत खरोचों से , जो बयाँ करते है हालत उसके जिस्मो - दिल की । ओढ़ के गुस्सा , रस्मों को लपेट बदन से , दिल के चिथडों को सिलती रहती है । दफ़्न करती है हर साँस को सीने में यूँ मानो एहसान कर रही है जी कर किसी पर । मुस्कुराती है , जब पाती है ख़ुद को ख़ुद के क़रीब , अक्सर ख़ुद से बातें करती रहती है । देखती रहती है खिड़की से बाहर बदहवास दौड़ते उस सड़क को , जहाँ कभी रखा था बड़े सुकून से काँधे पर 'उसके ', अपना सर । अब ऑंखें खड़ी - खड़ी जागती रहती हैं , और आस जगते - जगते सोने लगती है । यूँ उठा है अपनो से भरोसा ...

वो-१

रिश्तों में आई दूरियों को बालिस्तों से नापने बैठा है वो, अपने गुनाहों को गिन, ढापने बैठा है वो। अपने दायरों से रु-ब-रु होने की ख्वाहिश है उसे, जिन्हें अक्सर वो भूल जाता है, बैठ साँझ को कुरेदता फिरता है और यादों के साये में झूल जाता है। तिनका तिनका जोड़ एक घरौंदा बनता है, फिर उसे तोड़ने लगता है। माले से नोच मोतियों को एक-२ कर बिखेर देता है, उन्हें चुनता और जोड़ने लगता है। पागल है शायद, पागल ही होगा! बीते कल में अगले कल के निशान ढूंढ़ रहा है वो, डर लगता है उजाले से उसे, तो उजाडे में ऑंखें मूंद रहा है वो। अब अपने साये से भी डरने लगा है , अंधेरे का दामन थामे जी रहा है वो। पास आते-२ सब दूर हो जाते हैं उससे, अपने ही आदतों के कड़वे घूँट पी रहा है वो. उसके गुनाहों की फेरहिस्त लम्बी होगी.......... शायद........

मेरे सपने

दालान में बैठ खुद से बतियाते, पलकों पर मुस्कुराते रात रानी की तरह खुद पर इतराते, आँसुओं में डूबते -उतराते, नींद की देहरी लांघने को छट-पटाते, आँखों में कैद, बेचैन, पर फड- फडाते मेरे सपने गुलाबी रातों के वो नीले सपने, कोहरे से ढकी वादी, धुंध में गुम कुछ गीले सपने, रैक पर धूल फांकती किताबें, और उनमे दफन मेरे पीले सपने. अपनी ही आँखों में बेगाने, कुछ नए कुछ पुराने, कुछ जाने कुछ अनजाने, सारी रात दिए की तरह टिम टिमाते हैं लडखडाते हैं और फिर संभल जाते हैं एक हलके स्पर्श से बिखर जाते हैं, रात दिन जगती आँखों से देखे जाते हैं ये.... मेरे सपने...............

एक कविता: ये जिंदगी क्या है?

इंटरव्यू दे हताश-निराश घर लौटे हुए, पसीने से तर-बदर , थक कर, मेज़ पर फैली times ascent की कतरनों के बीच रिज्यूमे की फाइल रख कर , अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है? एक बुझते सिग्र्रेट से निकलता जलता हुआ धुआं, बरसात के मौसम में पानी को तरसता एक कुआँ, शेयर बाज़ार के संग डूबता-उतरता इन्सान खेलता हुआ जुआ। अक्सर सोचता हूँ मैं ये जिंदगी क्या है? संसद में नोट, परमाणु करार पर वोट, TV से चिपका इन्हे देखता एक सख्स खाए दिल पर चोट, T.R.P. की रेस में खोई मिडिया, सिंगूर-श्राइन में उलझी इंडिया। अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है? एक घुसखोर ऑफिसर की जेब से बहार झांकती नोटों की गड्डी, सामने की चाय की दुकान का छोटू और बगल में जलती कोयले की भट्टी एक टूटी कश्ती पर सवार आम आदमी हालत के थपेडों से पस्त , पब में होती एक पेज -३ पार्टी टकीला-पटियाला पी मस्त । अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है? सुने सड़क को निहारती एक जोड़ी पथराई आँखें सीने में दफ़न होती एक बूढी साँस, हाँथ में वोटर I.D. लिए एक नए नवेले वोटर की लोकतंत्र से टूटती रही सही आस । अक्सर सोचता हूँ मैं कि ये जिंदगी क्या है?

खून ...........(लधु कथा )

साला , madhadchod ... हरामी सूअर की औलाद............गालियाँ मध्धम होती गई..... चिलचिलाती धूप हरी राम को वापस वर्तमान में ले आई ... पसीने की वज़ह से बदन से चिपक गए कुर्ते को हाथों से शरीर से अलग करने लगा मगर कुर्ता तो फेविकोल की भांती चिपका पड़ा था ....अभी तो ३ ही बजाए थे घड़ी ने.... सड़क के किनारे नीम के पेड़ के छाव में बैठा गया.... दिल घर जाने को बेकरार था मगर ..ना जाने कितने ही सवाल उसके आने के इन्तिज़ार में खड़े होंगे मोहल्ले में.... बात सिर्फ़ मोहाल्ले के लोगों की होती तो नही डरता दिन में जाने से .. मगर गोलू के सवालों का क्या जबाब देगा? पापा पापा क्या अपने ४ लोगों को मार डाला है, अपनी बस से कुचल... किसने बोला तुझसे ये... गला घोंट दूंगा साले का....... जो मेरे बेटे को अनाप सनाप पट्टी पढाएगा....किस-किस का गला घोटोगे तुम.... मेरी किस्मत ही फूटी थी जो शादी की तुम से... पापा तो संदीप से शादी करा रहे थे delhi पुलिस में था... उससे शादी होती तो ये बार बार जेल में नही आना पड़ता .. आती भी तो एक पुलिस वाले की बीबी बन .. एक सजायाफ्ता कैदी से मिलने नही..... ३ साल में दूसरी बार सज़ा कट रहे हो............

अंगूर खट्टे हैं-4

लोमडी की आँखें ... या निहार की आँखें....... ... आँखें जो बिन कहे सब कुछ कह जायें....... आँखे जिसने कभी भी निहारिका से झूठ नही बोला........ निहार की ही हो सकती हैं ये आँखें ........... और इन आंखों ने देखते देखते उसे माज़ी (अतीत) के हवाले कर दिया... याद आ गया वो दिन जब वह निहार से मिली थी....... .उस दिन काल सेंटर जाने का मन बिल्कुल ही नही था। मगर जाना ही पडा... सुबह घर पहुचते ही अनिकेत का कॉल ... लडाई... फिर पुरे दिन सो भी नही सकी ... शाम को ओफ्फिस ॥ वही रोज की कहानी .... सर दर्द से फटा जा रहा था ... काम छोड़ .... बहार निकल गई, कॉरिडोर तो पुरा सिगरेट के धुएं से भरा था .. 'पता नही लोग सिगरेट पिने आते हैं या काम करने ' ........... कैंटीन में जा कर बैठ गई.. अपने और अनिकेत के रिश्ते के बारे में सोचने लगी ... न जाने किस की नज़र लग गई थी....वह ग़लत नही थी.. अनिकेत भी ग़लत नही था अगर उसकी माने तो.. फिर ग़लत कौन था...और ग़लत क्या था.. ..अब उन्हें एक दुसरे की उन्ही आदतों से चिड होने लगी थी जिन पर कभी मर मिटते थे.. आज-कल उसे कोई भी वज़ह नही नज़र नही आ रही थी जिसकी वजह से दोनों साथ रहें .. फिर ...

अंगूर खट्टे हैं....3

आँखें ठहर सी गई उस पेंटिंग पर .... पेड़ के नीचे खड़ी लोमड़ी.... अंगूर के गुच्छों को एक टक देखती लोमडी की आँखें ... थोडी अलसाई .. थोडी नशीली ... थोडी नींद से बोझिल आँखें निहार के अलावा किसकी हो सकती थी........ "तो तुम्हे सच में ये लगता है की मुझे तुमसे एक दिन प्यार हो जाएगा?" IIT कैंटीन में बैठे निहारिका ने निहार से पूछा था.. "हाँ" "हा हा हा हा ... तुम जागते हुए सपने देखना कब छोड़ोगे?" "यह हकीकत है " "ओह रिअली ! यू मीन आई विल फाल इन लव विद यू?" " हाँ" " हे हे हे... " निहारिका की हसी रुक ही नही रही थी.. " मजाक तुम से अच्छा कौन करेगा..?" "मजाक नही है यह... प्यार करने लगोगी तुम मुझसे.." "नो वे" "शर्त लगा रहे हो?" "हार जाओगे .." " मुझे हारना नही आता " " तो अब सीख जाओगे" " तुम शर्त लगा रहे हो ?" "अब हारने को कोई मरा जा रहा है तो मुझे क्या! डन!.." " वह तो वक्त ही बताएगा ..." " तुम और तुम्हारा optimism... ! वैसे तुम्हे पता भ...