Saturday, May 9, 2009

वो-१

रिश्तों में आई दूरियों को
बालिस्तों से नापने बैठा है वो,
अपने गुनाहों को गिन,
ढापने बैठा है वो।

अपने दायरों से रु-ब-रु होने की ख्वाहिश है उसे,
जिन्हें अक्सर वो भूल जाता है,
बैठ साँझ को कुरेदता फिरता है
और यादों के साये में झूल जाता है।

तिनका तिनका जोड़ एक घरौंदा बनता है,
फिर उसे तोड़ने लगता है।
माले से नोच मोतियों को एक-२ कर बिखेर देता है,
उन्हें चुनता और जोड़ने लगता है।

पागल है शायद, पागल ही होगा!

बीते कल में अगले कल के निशान
ढूंढ़ रहा है वो,
डर लगता है उजाले से उसे,
तो उजाडे में ऑंखें मूंद रहा है वो।

अब अपने साये से भी डरने लगा है ,
अंधेरे का दामन थामे जी रहा है वो।
पास आते-२ सब दूर हो जाते हैं उससे,
अपने ही आदतों के कड़वे घूँट पी रहा है वो.

उसके गुनाहों की फेरहिस्त लम्बी होगी.......... शायद........


2 comments:

allahabadi andaaz said...

बहुत ख़ूब ! आपकी कविता में कुछ शब्द वाकई अपना असर बख़ूबी छोड़ते हैं...
ख़ासकर...रिश्तों में आई दूरियों को बालिस्तों से नापने बैठा है वो,...काबिले तारीफ़ ! यू ही लिखते रहिए... माशा-अल्लाह !

rahul.ranjan said...

हौसलाफजाई का शुक्रिया!
मेरी कोशिश जारी रहेगी..
बस तम्मान्ना है आप जैसा लिखने की .....