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न जाने क्यों?

न जाने क्यों? एक अजीब सा खेल खेलती हो तुम ज़िन्दगी, छीन जाती है लबों की मुस्कान यूं ही, चलते-२ भटक सा जाता हूँ, जैसे भटका हो एक मुसाफिर धुंध में कहीं. मंजिल ख्वाब सी नज़र आती है तो उन्ही ख्वाबों में नज़र आती है मंजिल वही. न जाने क्यों? एक अजीब सा खेल खेलती हो तुम ज़िन्दगी, हर कदम पर रोड़े फैलाती हो तुम तेरे इन पथरीले रास्तों पर चलता हूँ ठोकर खाता हूँ, गिरता हूँ संभलता हूँ हाँथ बढ़ा छू लेना चाहता हूँ, अपनी मंजिल को घने कोहरे में खो जाती है मंजिल कही. न जाने क्यों? एक अजीब सा खेल खेलती हो तुम ज़िन्दगी, पैरों से रिसते खून से एक निशान सा बनता जाता हूँ, तुम एक भंवर सी नज़र आती हो चलते-२ पैर डगमगाते हैं तो बैठ जाता हूँ एक दिवा स्वप्न की तरह सामने खड़ी मुस्कुराती हो, मुड-२ के देखता हूँ जब भी, जहाँ से चला था खुद को अब भी वही पाता हूँ साहिल के रेत से टकराता हूँ, छिटकता हूँ और बिखर सा जाता हूँ न जाने क्यों? एक अजीब सा खेल खेलती हो तुम ज़िन्दगी, सारे रिश्ते बेगाने से नज़र आते हैं पलकों पर ख्वाब टहलते हैं, फिर रूठ जाते हैं ठूंठ की मानिंद खड़ा...

नीयत और नियति

अब भी देखता हूँ तुझे अपनी नियति से लड़ते हुए। तू तब भी लड़ती थी, बचपन से अब तक............ तुझे लड़ते ही पाया है, हालात से, जज्बात से, कभी ख्यालात से डरती नहीं है तू मुंह मोड़ती नहीं है तू.... हर वीरान सफ़र पर अकेली ही निकलती थी। शायद कोई उम्मीद होगी, लोग आएंगे और कारवां बनेगा! न कोई आया कभी, नाहीं बना कोई कारवां ... फिर भी थकते नहीं देखा तुझे। फिर भी ना रुकी कभी तू अपनी नियति के आगे कभी झुकी नहीं तू.. तेरी ये अनंत यात्रा अनवरत जारी है, जानता हूं तेरी नियत तेरी नियति पे भारी है। कहती थी तू "भाई, मुझे जीतते रहना होगा.. लड़की हूँ ना! एक बार हारी तो हारते रहना होगा.... " सच कहती थी .. बस एक बार हारी थी, फिर हारी थी बार बार! खो सी गई फिर कहीं तू..... माँ के कंधे पर सर रख सोते देखा कई बार, हार के तकिये को भिगोते देखा कई बार। आज बरसों बाद तुझे फिर से लड़ते हुए देखा। वो जीतने का ज़ज्बा वो जिद, उन्हें फिर से तेरी गोद में अंगड़ाई लेते हुए देखा। कुछ ख्वाबों को तेरी आँखों में फिर से पलते हुए देखा, कुछ आधी अधूरी ख्वाहिशों को तेरी पल...

पहले ना था

ये मंजर इतना खामोश सा पहले ना था तू मेरे पास हो के भी दूर इतना ना था हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ हैं, मगर दिल में ये सूनापन पहले ना था. तुम्हे याद कर दिल की कली खिल सी उठती थी आज दिल पे छाया है गुबार, पहले ना था. करार के इंतज़ार में काटी एक उम्र मैंने, करार पा बे-करार सा पहले ना था. उम्मीद का सुर्ख दामन थाम्हे जी रहा था मैं, मेरी उम्मीदों का दामन ज़र्द सा पहले ना था. तन्हाईयों में भी कभी तन्हा सा नहीं था मैं, अपना हो कर भी तू बेगानों सा, पहले ना था. यूँही कही से आ मुस्कराहट लपेट लेती थी मुझे खामोश सा अपना मिजाज़ पहले ना था. ये मंजर इतना खामोश सा पहले ना था तू मेरे पास हो के भी दूर इतना ना था

खँडहर

गहरे ज़ख्मों को तन से लगाये, हालाती थपेडों से चोट खाए, कभी धूल-धूसरित , कभी बरखा में नहाये। हर-दम सुनता हूँ उन्हें , बाते करते , इधर से आते जाते, गाते गुन-गुनाते , बुद-बुदाते, अपने वर्तमान पर अफ़सोस जताते। कई दौरों के गवाह , कई युगों से मूक दर्शक बन, धूप में तप , समय की बेदी पर छन, खड़े हैं सर ऊँचा कर आसमां में , नंगे तन। कुछ किवन्दन्तियाँ , कुछ जग जाहिर , कुछ जानी-अनजानी, हर एक ईट , हर एक पत्थर सुनाता है एक कहानी, कही खरोचों , कहीं ख़राशों , कभी खामोशी की जुबानी। ये ईमारत और इसकी हर दीवार , वक़्त के साथ बदल जाते हैं, कुछ खड़े हैं , कुछ गिरते हैं , कुछ शाम के साये में ढल जाते हैं, शालीनता से मुस्कुराते हैं , अपनी यादों में जल जाते हैं। गवाही देते रहते हैं अपने गौरवशाली अतीत का, वक्त के के साथ बदल जाने की , प्रकृति के रीत का, किसी कोने में कैद नफ़रत तो दिल में दफन प्रीत का, अपनी हार और काल-चक्र के जीत का। सोचता हूँ , शायद हर गौरवशाली अतीत का वर्तमान खँडहर ही होता होगा!

पगली

खामोशी से कुरेद रहा था सपनों को बेगाने से आशियाने में ढूंढ़ रहा था अपनो को. यूं हीं एक आहाट पे दरवाजा खोला दस्तक थी ज़िन्दगी की, खड़ी थी सामने... एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी. एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी. छिटक सी गयी धूप चहू ओर, सामने थी एक परी एक मासूम की अल्हड अंगडाई सी... मेज पर फैले कागज़, उडाती, दरख्तों से धूल हटाती खिड़की से आ घर में भर गयी एक शीतल पुरवाई सी.. खामोश सा मंज़र खिल उठता है उसके आमग भर से महकी-महकी सी लगती है अब तो तन्हाई भी. जीने लगा हूँ कई जिंदगियां हर पल में मैं अब तो प्यारी लगती हैं उसकी बेरुखी, उसकी हर रुसवाई भी. उन आँखों में तैरते हैं कई सपने लगती है ये ऑंखें कभी अपनी, कभी बेगानी तो कभी सौदाई सी.. एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी. एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी.

वो (भाग-2)

( मेरे प्यारे से दोस्त गोल्ड फिश को समर्पित ) रात - दिन ताना- बाना बुनती रहती है वो फिर उलझाती है खुद को उन्ही तानों में, मथती रहती न जाने क्या हरदम, गुम हो अपने ही ख्यालों में , बल पड़ते हैं सोच-२ उसके पेशानी पर। समझ न पाई है रिश्तों के भ्रम - जाल को खीजती है कभी , रोती है कभी , कभी गुमसुम , तो कभी हँस लेती है, रिश्तों को निभाने में दिखलाई अपनी नादानी पर । ढका है रूह अनगिनत खरोचों से , जो बयाँ करते है हालत उसके जिस्मो - दिल की । ओढ़ के गुस्सा , रस्मों को लपेट बदन से , दिल के चिथडों को सिलती रहती है । दफ़्न करती है हर साँस को सीने में यूँ मानो एहसान कर रही है जी कर किसी पर । मुस्कुराती है , जब पाती है ख़ुद को ख़ुद के क़रीब , अक्सर ख़ुद से बातें करती रहती है । देखती रहती है खिड़की से बाहर बदहवास दौड़ते उस सड़क को , जहाँ कभी रखा था बड़े सुकून से काँधे पर 'उसके ', अपना सर । अब ऑंखें खड़ी - खड़ी जागती रहती हैं , और आस जगते - जगते सोने लगती है । यूँ उठा है अपनो से भरोसा ...

वो-१

रिश्तों में आई दूरियों को बालिस्तों से नापने बैठा है वो, अपने गुनाहों को गिन, ढापने बैठा है वो। अपने दायरों से रु-ब-रु होने की ख्वाहिश है उसे, जिन्हें अक्सर वो भूल जाता है, बैठ साँझ को कुरेदता फिरता है और यादों के साये में झूल जाता है। तिनका तिनका जोड़ एक घरौंदा बनता है, फिर उसे तोड़ने लगता है। माले से नोच मोतियों को एक-२ कर बिखेर देता है, उन्हें चुनता और जोड़ने लगता है। पागल है शायद, पागल ही होगा! बीते कल में अगले कल के निशान ढूंढ़ रहा है वो, डर लगता है उजाले से उसे, तो उजाडे में ऑंखें मूंद रहा है वो। अब अपने साये से भी डरने लगा है , अंधेरे का दामन थामे जी रहा है वो। पास आते-२ सब दूर हो जाते हैं उससे, अपने ही आदतों के कड़वे घूँट पी रहा है वो. उसके गुनाहों की फेरहिस्त लम्बी होगी.......... शायद........