Tuesday, June 23, 2009

पगली

खामोशी से कुरेद रहा था सपनों को
बेगाने से आशियाने में ढूंढ़ रहा था अपनो को.
यूं हीं एक आहाट पे दरवाजा खोला दस्तक थी ज़िन्दगी की,
खड़ी थी सामने...
एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी.
एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी.

छिटक सी गयी धूप चहू ओर, सामने थी एक परी
एक मासूम की अल्हड अंगडाई सी...
मेज पर फैले कागज़, उडाती, दरख्तों से धूल हटाती
खिड़की से आ घर में भर गयी एक शीतल पुरवाई सी..

खामोश सा मंज़र खिल उठता है उसके आमग भर से
महकी-महकी सी लगती है अब तो तन्हाई भी.
जीने लगा हूँ कई जिंदगियां हर पल में मैं
अब तो प्यारी लगती हैं
उसकी बेरुखी, उसकी हर रुसवाई भी.

उन आँखों में तैरते हैं कई सपने
लगती है ये ऑंखें कभी अपनी, कभी बेगानी तो कभी सौदाई सी..
एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी.
एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी.