Monday, July 26, 2010

आहुति

यह कोई नई बात नहीं थी उसके लिए.... यह तो रोज का काम था उसका.... दिन को शाम का पैबंद लगा.. रात से जोड़ देता था... रात आती तो तकिये के नीचे छुपाए हुये अपने सपने को आँखों में डाल लेता... और फिर वही से आगे देखना शुरू करता जहाँ पिछले रात छोड़ी होती थी.... जाने वह ऐसा कब से करता आया था..... अपनी उम्र का तमाम हिस्सा, उसने ऐसे ही काटा था ....

मगर......... उस रोज.. आदतन दिन को शाम का पैबंद लगा .. रात से जोड़ा ....मगर आज सपनों की दुनिया में जाने की ख्वाहिश नहीं थी उसे ....-यंत्रवत उसने सूरज को बुझाया और रात्रि को आने का निमंत्रण भेजा ....मगर रात आई नहीं और शाम में उसकी ज़िंदगी उलझ कर रह गई ..... आँखों में कैद सपने भड़कने लगे.. कभी शूल से चूभे, तो कभी शोलों की तरह भड़कने लगे ....शाम लावारिस सी नज़र आई ....उसने भरमाया अपने मन को कई बार ....पर संध्या की यह झलक उसके बावरे मन को रास आई....सूरज बुझाते वक़्त थोड़ी सी आग छुपा ली थी... उसने उस आग को निकाला अपने अरमानों का ढेर लगा उसमें, सूरज की आग डाल दी ....उसके अरमानों के जलते महल ने लालिमा बन के विशाल धनक को ढक सा लिया....-जलते अरमानों के धुंध में परिंदों ने छटपटाना शुरू कर दिया उनके कोलाहल से संपूर्ण वातावरण गुंजित हो उठा ....पखेरू इतर उतर से अपने आशियाने की ओर भाग रहे थे मगर ....वह पागल .... अपने आशियाने के तिनके में बिखेर, अरमानों के जलते महल के आग में स्वाहा कर रहा था ....आशियाने का तिनकों का घी पा अरमानो का अलाव अपने चरमोत्कर्ष पर जा पँहुचा ....अलाव जला, अब वह अपना हाथ सेक रहा था ....अलाव से निकलते धुएं ने धुंध को और गहरा दिया ....-वह अब पहली बार मुस्कुराया अरमानों की आहुति पूरी जो हो चुकी थी…..

अलाव की आँच अब मंद हो चली …. वह किसी भी कीमत पर आग को बुझने नहीं देना चाहता था ....अब उसने आँखों को टटोला.. एक काँच का ख्वाब जो वह जाने कब से देखता रहा था ....रोज ही तो देखता था वो, अब वह नासूर बन उसकी आँखों में किरकिरी की तरह चुभ रहा था ....अपनी नम पलकों से नोच उस सपने को हथेली पर रखा सपने में सीलन थी ....-अभी भी नम था... देखा तो पाया भले ही इस सपने को वर्षो से पाल रखा था मगर सपना बड़ा ही छोटा था....वैसे भी उसके सपने तो हमेशा से ही छोटे रहे थे, मगर ख्वाब तो ख्वाब ठहरे ....भला उनकी ताबीर ही क्या ....इस ख्वाब को उसने अलाव को समर्पित कर दिया... फिर एक- कर भीगी पलकों से सारे सपनों को नोच नोच कर आहुति देनी शुरू कर दी ....-गीले सपनों के ईंधन ने अलाव को और धुआँ उगलने पर मजबूर कर दिया .... अब आग ना जल रही थी और ना ही बूझ रही थी वह फूँक मार मार अग्नि देवता को प्रसन्न करने की कोशिश में लगा रहा ....मगर उसकी हर कोशिश पर धुए ने कालिख पोती ....उकता कर वहीं बैठ गया ....उसकी उलझनों की गुत्थी सुलझने की बजाय और उलझ गई ....वह किसी से शिकवा-शिकायत भी करता तो किससे करता?आखिर उलझनों को अपना पता खुद ही तो देकर आया था---वक़्त गुजरा.. सांझ का साया और गहराया ....देर से ही सही ....मगर रात्रि ने उसके दरवाजे पर दस्तक तो दे ही दी ....मन ही मन वह बहुत खुश हुआ ....आखिर वह भी तो यही चाहता था की रात आए ....बुलावा जो भेजा था उसने ....

अरमानों और सपनों की आहुति के बाद उसने चैन की साँस ली ....-मगर यह सुकून क्षणिक था....दूरगामी नहीं ....आदमी जो ठहरा …. मन अरमान विहीन कब तक रहता .... और आँखों ने सपने के अलावा देखा ही क्या थादिल पर हाथ रखा तो पाया ....कुछ नए अरमानों का पल्लवन हुआ थाकई सारी कोपलें निकली थीं.... नए अरमानों की.... बड़े ही ज़ोर से हंसा वो... उसकी अट्टहास स्याह रात में दूर-2 तक गूँजी.... उसके खुशी का ठिकाना रहा... अरमान ही सही आखिरकार उसके जीवन में कुछ तो नया था.... इधर आँखों में नए सपनों की कुलबुलाहट शुरू हो गयी थी।

वह वही लेट गया .... ठंड लगने लगी थी... अपने लिहाफ़ को कस लिया उसने... हाथों को जेब में छुपा लिया...जब हाथ जेब में पंहुचे तो उन्हे कुछ मिला... बाहर निकाल कर देखा तो वो बीजें थी... चाँद की बीजें... एक पुर्णिमा की रात जब वह चाँद के साथ उसके छत पर बैठा, सिग्रेट पी रहा था... बहुत सी बातें हुई उस रात को... बातें करते करते चाँद धूए में अपने दिल का गुबार निकलता रहा और वह अपने दिल का... दोनों ने ही एक दूसरे का दिल जम कर जलाया... सिग्रेट पी-पी कर जब चाँद थक गया तो वह अपने आप में कहीं गुम हो गया... उसे अंदेशा हो गया था, शायद चाँद के साथ यह उसकी आखिरी रात हो... उसने चुपके से चाँद के बालों को सहलाया... उनमे लगे फूलों को चुपके से चुरा अपनी जेबों के सुपुर्द कर दिया.... उसके बाद उसने चाँद को कभी नहीं देखा... और चाँद ने भी मुड़ कर उसे देखना गंवारा समझा.... आज वही फूल बीज का शक्ल अख्तियार कर उसके सामने थे.... प्यारे-2 नन्हें-2 चाँद के बीजों को देख उसके अधरों पर मुस्कान की एक रेखा खिच गयी... प्यारे तो होंगे ही आखिर चाँद के जो बीज ठहरे... खूबसूरत तो उन्हे होना ही था...

अपनी जगह से उठ, सड़क के किनारे एक नन्हें चाँद को धरा की कोख मे डाल दिया... वापस उसी बरगद के नीचे चाँद के उग आने का इंतज़ार करने लगा... रात गुजरती गई... मगर चाँद का कोई अता- पता नहीं था... जा कर चाँद के उस बीज की सिचाई की.... खाद भी डाला... मगर..... चाँद को उस दिन नहीं आना था .....सो वह नहीं आया ..... अपने हाथ को सीने पर रख धीरे से सहलाया , हौले से एक फूँक मारी... अपने पागल दिल को समझाया.... कहा दिल से उसने आज तो अमावस की रात है और अमावस को भला चाँद निकलता है क्या? वक्त लगेगा चाँद को पनपने में... बड़ा होने में ...दिल बहल गया... वह जानता था दिल को ज़िंदा रखने को बस एक उम्मीद भर की जरूरत होती है .... और उसी उम्मीद के सहारे वह ता-उम्र धड़कता रहता है... अपनी ज़िंदगी गुजार देता है....

अलाव बुझ चुकी थी... पर राख...? राख़ तो अभी भी जल रही थी... जा राख पर बैठ गया और अपने पिछले अरमानो की तपिश को महसूस करने लगा... बड़ी ही सरगोशी थी उस तपिश मे.... एक अजीब सा अपनापन सा लगा... यूँ लगा की चाँद की गोद में लेटा हो... चाँद का दामन पा, आँखें बोझिल हो चलीं.... पलकों को ज़ोर से मसला... आज वह सोना नहीं चाहता था... जनता था जैसे ही नींद आएगी आँखों में सपने घर कर लेंगे.... वह कोई भी सपना देखना नहीं चाहता था.... सपने को देख वह खुद को उन हालतों में दुबारा नहीं पाना चाहता था... जहाँ हकीकत और सपने का अन्तर मिट जाता है... हकीकत को ख्वाब और ख्वाब को हकीकत समझने की पुरानी भूल को दुहराना नहीं चाहता था...

अतः उसने सोचना शुरू कर दिया ... ख्याल बुलबुलों की तरह उभरते रहे और फूटते रहे.... और वह उन्ही के संग डूबता उतरता रहा.... तभी एक ख्याल ने उसकी तंद्रा भंग कर दी... जब यह सोचा कि कल चाँद उगेगा... फिर धीरे-2 बड़ा होगा, उसका यौवन आयेगा... पुर्णिमा आएगी.... फिर.... चाँद कि शक्ति क्षीण होती जाएगी.... और चाँद फिर से उससे रूठ जाएगा... तब? तब वह क्या करेगा? कुछ सोचा उसने और मुस्कुराया.....जीवन का मर्म उसके समझ में गया था... अब वह खुद को हुनरमंद समझने लगा... अब निर्णय लेने का वक्त था... उसने लिया भी... अब वह हर अमावस को इसी बरगद तले आयेगा... अपने अरमानो की आहुति देने... फिर चाँद को बोएगा ….. चाँद बड़ा होगा , फिर बूढ़ा ... फिर वह दुबारा से आयेगा... और यह क्रम अनवरत चलता रहेगा... जीवनपर्यंत .... जब तक उसकी खुद कि पूर्णाहुति नहीं हो जाती......

उठ बैठा वो बहुत खुश था.... जीने कि एक वजह जो मिल गई थी उसे.... जेब टटोल एक कपड़े का टुकड़ा निकाला .... रात को भोरका पैबंद लगासुबह को जो बुलाना था... सुबह जब आएगी तब लकड़ियाँ चुन आशियाना बनाएगा... सुई निकाली, धागा लगा, रात को भोरके पैबंद लगाने में संलग्न हो गया...

तम पर उसने अपने विजय का परचम लहरा दिया था.... शायद।

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My heart felt appreciations to Sushant Mishra, who has been editor to all of my posts and my work till date, even without a single penny...

and for all who always encrouse and inspire me to write, Frooti, Golfdish, Abhinav and Pallavi...thanks for being my friend and critic at same time..

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


http://charchamanch.blogspot.com/

रचना दीक्षित said...

वाह !!!! क्या पैबंद लगाया है. सोच, भाषा,शब्द और गति सब नियंत्रित होते हुए भी अविरल प्रवाह. बेजोड़... लाजवाब...

Poorviya said...

wahi kalam tod ka likhta ho likho likho