Sunday, July 4, 2010

प्रतीक्षा...



घर को सजा
दीवारों पर पोस्टर लगा

खिड़की खोल
, परदे हटा,
दरवाजे से सर को सटा
,
एक टक
, सूनी सड़क को देखता हूँ,
और देखता रहता हूँ...


पसीने से लदफद
पथिक
बूढ़े बरगद तले बैठता है सुस्ताने
,
चिड़ियों में नहीं नज़र आती कोई चपलता
,
सुबह-सबेरे जो लगाती थी चहचहाने

ग्रीष्म के तपिस को सहता हूँ
,
और सहता रहता हूँ...


दिल की नदी सूखी पड़ी है
,
कल्पनाये बंजर हो चली हैं
,
सूखा है गुल
, सूखी कली,
खामोश सा मंज़र
, सूनी गली,
कागज़ पर कुछ लकीरे उकेरता हूँ
,
और उकेरता रहता हूँ...


ना वो शब्द हैं
,नहीं वो भाव,
नहीं इनमें है कोई सरगोशी,

नहीं है वो पहले सा अलाव,

ना कुछ करने की इच्छा है
, नाही चाव
फिर भी तेरे कथन पर कुछ न कुछ करता हूँ
,
और करता ही रहता हूँ...


न मन में कोई अवसाद है

और नहीं कोई व्यथा
,
माथे पर हैं कुछ खुरचने,

बयाँ कराती विरह कथा.

तेरी आमाग का इन्तेजार करता हूँ

और करता ही रहता हूँ.. और
करता ही रहता हूँ...

2 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

प्रतीक्षा की सुन्दर अभिव्यक्ति...

मंगलवार 06 जुलाई को आपकी रचना....व्यथा ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

rahul.ranjan said...

'व्यथा' को चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच में लेने के लिए संगीता जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद...