शनिवार, 17 सितंबर 2011

जलन


आखिर मेरी खता क्या है?
जब भी सूखता हूँ,  गीला कर जाते हो!
तनता हूँ और तुम गिराने आ जाते हो. 
मेरी हस्ती को मिटने की कोशिश कर तुम क्या पाते हो?
उस रोज उकता कर साहिल ने समंदर से पूछा ...
समंदर एक कुटिल मुस्कान मुस्काया..
एक लहर से साहिल के कन्धों को थप-थपाया
बोला...
मैं अनन्त , अथाह और अपराजेय हूँ....
पर तुमसे जलता हूँ...
क्योंकि तुम वहां से शुरू होते हो..
जहाँ मैं ख़तम होता हूँ..... 

3 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह ..अद्भुत

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

kitni gehri baat kah di. kamaal ki rachna.

rahul.ranjan ने कहा…

Sangeeta ji aur anamika ji... bahut bahut dhanyvad !