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संदेश

एक मुलाक़ात....

कल सपने में मिली थी वो.. मेरी कल्पनाओं से परे.. आँखों में हंसी सपने भरे.. चहरे पर मुस्कराहट लिए... पग-२ खुशियों की आहट लिए.. हर हंसीं चहरे से हंसीं... नूतन नवीं... हैरान परेशां मैं.. उसकी आँखों में झाँक रहा था.. मंत्र मुग्ध, सम्मोहित सा, उसके चहरे को ताक रहा था.. बढ़ा हांथों को उसने मेरे चहरे को छुआ.. एक सिहरन सी हुई बदन में... दर्द मिट से गए.... लगा यूँ भगवन ने खुद ही दी है एक दुआ... कौन हो तुम ? पूछा मैंने.. पलकें झपका.. होठो को कर गोल.. बोली ज़िन्दगी हूँ मैं.... ज़िन्दगी.... चौका था मैं उस बात पर.... अगर तुम ज़िन्दगी हो तो  वो कौन है जिसे मैं जानता हूँ... जीता आ रहा हूँ जिसके साथ, आज तक जिसे अपना मानता हूँ? तू पागल है बोली वो... वो भी मैं ही हूँ... पर तुने बस मेरे एक रूप को चुना है  जीवन की अपनी इबारत उस रूप से बुना है... तू बरसों पहले के वक़्त में रुक गया है.. तन कर खड़ा होना था जहाँ वहीँ झुक गया है.... उठ, आगे बढ़, उंगली थाम मेरे साथ चल... जिसको तू जी रहा है वो आज नहीं, है तेरा कल... तू काँटों में क्यों में क्यों उलझा पड़ा है....

साल का आखिर सच...

स्याह रात ने अपने पर फैला दिए थे .... साये गहरे होते जा रहे थे.... वो तड़प रहा था... सितारों ने बेड़ियों से जकड़ लिया था उसे....... आवारा उल्कायों ने पहले उसे दोस्ती के जाल  में फसाया और फिर जाते जाते उसे दाग दे कर चली गयीं ... अनगिनत दाग...उसके चहरे पर वो धब्बे साफ साफ नज़र आ रहे थे.... आवारा उल्काओं से उसकी दोस्ती धरती को पसंद नहीं आई थी शायद ... अब धरती की परछाई 'चाँद' को निगल रही थी... उसका अस्तित्व ख़त्म हो रहा था.... चांदनी का भी दम घुटा सा जा रहा होगा ... तभी तो उसकी रंगत पिली पड़ती जा रही थी.. चाँद की हमदर्द चांदनी ने भी शायद उससे दूर जाने का फैसला कर लिया था.... निसहाय सा चाँद उसे बस जाते हुए देख रहा था.... वो अपना हाँथ बढ़ा चांदनी की कलाई थाम लेना चाहता था..... पर उसके हाँथ तो उठे ही नहीं.... गुनाहों के बोझ तले दबे जो थे.... और बेरहम चांदनी? उसने तो पलट कर देखना भी गवारा न समझा...... चाँद की आँखे भर आई... उसकी आँखों से खून टपक रहा था...टप- टप... टप.. कर खून का हर एक कतरा मेरे लिहाफ को भिगोता रहा.... छत पर खड़ा मैं चाँद की इस दुर्गति का मूक दर्शक भर था....

चेहरे

वो आइना अपना सा लगता था मुझे, आखिर उसी में तो एक चेहरा दिखता था जो जनता था मुझे, पहचानता था मुझे... एक रोज हवा का एक झोका  उसकी बुनियाद हिला गया, उसके अस्तित्व, उसके  अरमानो को मिटा गया. कराहता मिला था फर्श पर मुझे, उठाया, देखा, और पाया, कितना झूठा था मेरा आइना ता-उम्र मुझे एक झूठा चेहरा दिखाता रहा, मेरी वास्तविकता मुझसे ही छुपाता रहा, उसके को सच मन मैं बरसों इतराता रहा.. पर जाते-२ वो मुझे मेरी हकीक़त बता गया, मुझे मेरे अनगिनत चेहरा दिखा गया, चेहरे पर पहने थे कई चेहरे मैंने वो सब  से रु-ब-रु करा गया... वो टूट गया, अपना सा लगाने वाला  वो चेहरा मुझसे रूठ गया.. फिर आइने का सामना कम ही कर पता था, दिखाता था जिधर उधर जाने से कतराता था, खुद से नज़ारे मिलाने में ये शर्म कैसी? और क्यों? क्या मैंने गुनाह किया है? क्या मैंने सिर्फ झूठ को जिया है? नहीं,, तो फिर दर्पण से ये डर कैसा? सोच यह, कर हौसला बरसों बाद. आँखों के सामने से गुजरे  अपने ही चेहरे को कर के याद.. आज आइने से टकरा गया अपने नए नवेले अनोखे चेहरे  को देख घबरा गया.. खुछ खो सा गया था...

असुर

सौहार्द, अहलाद, आनंद परित्यक्त  देवत्व की राह चुनी  त्याग पुरुषत्व  भावनाओं के खँडहर पर  खड़ा, लाचार बेबस  मानव हो देवत्व की राह क्यों? जिस पथ पर तू चल नहीं सकता  उस पथ की चाह क्यों? पथिक तू क्यों है निर्बल, एकाकी, अधीर? काँटों का ताज तुने ही चुना.. क्यों घबराता है तम से अब  भ्रम का मकडजाल तुने ही बुना.. लक्ष्य से विचलित, विमुख मानव  तू जीवन के ज्वलंत ज्वार में खो गया है, ज़िन्दगी की ताल से खो कर सुर अब तू न मानव रहा,न देव है तू एक असुर हो गया है..... 

चाय गिरा एक पन्ना...

ऑफिस में बैठे बैठे कुछ वक़्त मिल गया... या यूँ कहूँ तो मैंने कुछ वक़्त चुरा लिया...कुछ लिखने की सोची.... घन्टों लम्बी मत्थापच्ची .. भीर कुछ नहीं समझ आया... लगा लेखनी पर धूल जम आई है.. देखा तो पाया धूल तो मेरी टेबल पर भी जम गई थी..कम ही पलट कर देखता हूँ ना पलट कर टेबल पर बिखरे पन्नों को... लोग भी कहते हैं रहने दो.. इसे देख   writer  वाली   feel  आती है... तो ऐसे ही छोड़ देता हूँ.. ज़िन्दगी की तरह पन्ने ही  बिखरे हों   तो कागज़ के पन्नो के बिखरने से फर्क ही क्या पड़ता है.... पर आज का दिन कुछ और ही था... आज धूल को जाना ही था.... एक-२ कर ... परत-दर-परत धूल हटता गया... टेबल पर बिखरे स्क्रिप्ट्स के बिच एक पन्ना हाथ लग गया...देख चेहरे पर मुस्कान बिखर गई.... सफाई छोड़... पन्ने की खूबसूरती में खो गया...   चाय गिरी थी ना तुमने उस दिन... टेबल पर... शायद ये भी उस सुनामी की चपेट में आ गया होगा... याद हैं ना उस रोज वो कांच का कप कैसे तुम्हारे हाथों में आते ही कैसे अस्तित्व हीन हो बैठा .. मेरी ही तरह... और.......   वो पन्न...

जलते हुए सिग्रेट की आवाज़

कभी जलते हुए सिग्रेट की आवाज़ सुनी है तुमने? एक अजीब सी आवाज़, सन्नाटे को भेदती.. मानो उसे मिले हर ज़ख्म का हिसाब मांगती हो... कितनी मिलती है ना उसकी आवाज़ मेरे दिल की आवाज़ से....? सुन अपनापन सा लगता है. वही चीर-परिचित सदायें, वहीँ धुआ-२ सा माहौल.. कभी सुनना इस व्यथा को तुम, मेरे दिल की सदाओं जैसी ही लगेंगीं, आखिर दोनों एक ही तो हैं.. जनता हूँ, सुन कर यहीं सोचोगे कि तुमने कौनसे ज़ख्म दिए हैं मुझे? मैं भी सिग्रेट जला यही सोचता हूँ.. इसके सवाल बेमानी से लगते है... मगर जलन उसका क्या? मेरी और सिग्रेट की फितरत लगभग एक सी हैं.. बस फर्क इतना भर ही है सिग्रेट जलाते जलते बुझ जाती है.. और मैं बुझते-२ जल जाता हूँ... एक जल कर भस्म  हो जाता है और एक...... जितना बुझाओ उतनी ही शिद्दत से जलाता है.... एक बार जरुर जलाना सिग्रेट.. शायद बुझने से पहले ये उन सवालों को पूछ बैठे .. जो मैं जीते-जी, कभी ना पूछ पाऊं... एक कश जरुर लेना... शायद.. सिग्रेट की आत्मा को शान्ति मिले.. बुझने से पहले वो उन होठों  को छू कर गुजरे.. जिनसे अब मेरा नाम ... बमुश्किल ही निकलता हो...

इधर-उधर से.....

१)  ख्वाबों के बोझ से कुचले  आसमां में उडान का सबब धरती पर गिरा वो लहूलुहान परिंदा बता गया... २) उसे कोई त्याग की प्रतिमूर्ति कहता था, कोई महान, तो कोई देवी... सुना है वो कल रात  गुज़र गई, पर जीते जी किसी ने उसे इन्सान नहीं समझा.... ३) याद है  उस रात तुमने मेरे तकिये के नीचे कुछ अध् खिले सपने छिपाए थे, सुबह जब आँख खुली तो उनकी खुशबू से मेरा कमरा महका हुआ था... ४) जब भी तुम घर आये, तुम्हारे चहरे को डायरी में दर्ज किया, आज डायरी के पन्ने  पलटे तो देखा तुम्हारा सुर्ख चेहरा ज़र्द पड़ा था.... ५) तुम तो कुछ भी नहीं भूलते थे ना.. कल सामने से यूँ निकले जैसे कभी देखा न हो, शायद यादों के दरख़्त पर धूल जम आई होगी.... ६) उस चहरे से मासूमियत झलकती थी, कल देखा तो उस पर अनगिनत खरोंचे थीं, हवाएं जहाँ से गुजरती है अपने निशां छोड़ जाती हैं... ७) उस अछूत के घर रोशनी कम ही आती थी  पर कुछ दिनों से उसका घर गुलज़ार है, सुना है, सरकार  ने सूरज की रोशनी पर भी 'कोटा' लगा दिया है......