Friday, October 1, 2010

चलते -फिरते

१) शाम की लालिमा ओढ़े विशाल व्योम को देखा,
रात को जलते बुझते जुगनू से कुछ  सपने,
अब आसमान छोटा  और सपने बड़े लगते हैं मुझे! 

२) उसकी आवाज़ वादी में गूंजती रहती है,

कहते हैं वो बहुत सुरीला था कभी,
पर लोग अब उसे कश्मीर कहते हैं...







३) वो आग जैसी थी, सूरज सी गर्म  

उसके एक  इशारे पर हवाएं अपना रुख बदल लेती थी,
सुना है कल अपन घर जला बैठी है वो....





४) बहुत ऊँचा उड़ाती थी वो,

आसमान में सुराख़ कर आई,
सुना है उस सुराख़ से खून टपकात है उसका....

11 comments:

Udan Tashtari said...

सुन्दर भावपूर्ण.

Sunil Kumar said...

सुंदर अभिव्यक्ति , बधाई

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका, मनोज कुमार,की प्रस्तुति राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...हर क्षणिका गहन ..

अनामिका की सदायें ...... said...

गहरे भावो से भरी क्षणिकाएं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

यहाँ भी आयें .

monali said...

Very thoughtful n soulful... sply da one, describing da Kashmir..

वाणी गीत said...

भावपूर्ण क्षणिकाएं ...!

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ऊँचा उड़ाती थी वो,

आसमान में सुराख़ कर आई,
सुना है उस सुराख़ से खून टपकात है उसका....


झंझोड़ गयीं अंदर तक सब क्षणिकाएँ ... बहुत कमाल कालिखा है ...

anu said...

बहुत सुंदर और भावपूर्ण क्षणिकाएँ.....