Thursday, September 9, 2010

उजाले की आस



उस झोपड़ी के आगे 
दिया रोज टिमटिमाता है,
सूरज के बुझते ही वो बूढ़ा
रोज चिराग जलाता है.

अँधेरा घना है सूरज रास्ता भटक जायेगा
कहता है और मुस्कुराता है.
दिया जला हर मौसम में 
दिवाकर को अपने घर का पता बताता है.

कह कर गयी थी वो उससे की वो चाँद है
सूर्य किरणों से ही जलती है
रौशनी में ऑंखें चौधियाती हैं 
इसलिए छिप कर अँधेरे में निकलती है.

तबसे किसी ने उसे थकते नहीं देखा 
कहते हैं उसके घर उम्मीदे बरसती हैं.
उजाले की आस में जीता है हर रोज
अँधेरे की सांसे उसकी देहरी लांघने को तरसती हैं.

उजाले का पुजारी जो ठहरा
सूरज से लाली चुरा चाँद को चमकता है
गुम न हो जाये अँधेरे में सूरज कहीं इसलिए
दिया जला भोर तलक सूरज को रास्ता दिखलाता है.

तन से बूढ़ा है, पर मन से जवान,
रुकन,थकन जैसे अहसासों से बिलकुल अंजान,.
तिमिर नहीं आता कभी उस घर के आस-पास
लाखो जुगनू बसते हैं उस घर में
बस्ती है वही उजाले की आस......

कहते हैं न जहाँ रौशनी होती है वहां कभी अँधेरा नहीं होता.....

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर भाव ...पढ़ना अच्छा लगा ..

अनामिका की सदायें ...... said...

आप की रचना 10 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
http://charchamanch.blogspot.com


आभार

अनामिका

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

वन्दना said...

गज़ब के भाव भरे हैं………………बेहद भावभीनी रचना………………उजाले की आस हो तो उजाला कैसे न होगा।

शोभा said...

भाव भीनी प्रस्तुति के लिए आभार।

रंजना said...

सुन्दर बिम्ब प्रयोग...भावपूर्ण रचना...