Tuesday, August 17, 2010

अन्नत यात्रा




अन्नत यात्रा

जल थल खुले मैदान
बाग बगीचे खेत खलिहान
पथरीले पहाड़ या अरण्य सघन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

जो चाहा करता गया
जीता गया –  मरता गया
बारिश बटोर , शबनम चुन
अपना घड़ा  भरता  गया
सुनता रहा मन मंदिर का कथन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

कुमुदनी से महक चुराता
मृगनयनी से नयन मिलता
बगिया-बगिया फूल खिलता
मारीचिका   से बचता बचाता
घनश्याम नैनों में लिया लगन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला  अपनी धुन में मगन

ना भीड़ का  हिस्सा बना
ना झुका , ना ही तना ...
ना जुलूस न भाषण,
कोई कहानी न किस्सा बना
छू न  सकी उसे थकन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

कभी केचुले बदल
कभी शाम में ढल
पत्थर सा जम
मोम सा पिघल
मन में  पोषे भानू सा तपन
चलता रहा -चलता रहा
मतवाला अपनी धून व मगन

बरसा जैसे काली बदरी
गाता फिरता सावन की कजरी
फिरता मुसकता
गाँव गाँव नगरी नगरी
छाता रहा ज्यो सदृश्य गगन
चलता रहा .चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

चीर काल  से अनंत
बढ़ता  रहा –  बढ़ता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन