अल्हड सा बचपन सावन का यौवन, पतझड़ की किलकारी फागुन की पिचकारी वो नीम, वो झूला, कागज के कप, मिट्टी का चूल्हा एक बरसाती नांव वो सर्दियों में अलाव यौवन का दस्तक, बचपन की विदाई, तेरी पहली अंगड़ाई वो शाम हरजाई. तेरी तिरछी नज़र वो कच्ची उम्र भीड़ में तन्हाई पहले प्यार की परछाई. दिल बेकरार तेरा इंतजार मोहब्बत का इजहार और..तेरा इनकार शूल सी चुभन, मन में दहन बर्ताव अनजाना मेरा रूठना, तेरा मनाना.. स्वप्नों का पल्लवन मुस्कराहट का नमन दिल धीर-अधीर मैं, तुम, और नदी का तीर. जज्बातों की गिरह खयालातों की जिरह मन पे उकेरी इबारत ख्वाबों की ईमारत न अब वो पल हैं नाही पलछिन, न जाने कहाँ हो तुम मैं भी हूँ कहीं गुम... न तू, न मैं क्या जय, क्या पराजय. उन शब्दों की खनक ज्यों विशाल धनक.. काली घटा तेरी छटा, तम् घोर, इत-उत चहुँ ओर.. राह ताकती ऑंखें, तेरी धुंधली छवि, वो मासूम पल, मेरा आज, मेरा कल तेरी रुखी आवाज़ वो रूठे साज रिश्तों की दूरियां तेरी मेरी मजबूरियां बिन तेरे भोर एक ख़ामोशी का शोर, आँखों की गुफ्तगू और तेरी जुस्तजू. तन्हा सा...
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार