Tuesday, November 1, 2011

रिश्ता


हर रोज ये शाम कितनी आसानी से सूरज को बुझा देती है!
काम इतनी सफाई से होता है कि सूरज की आग का एक कतरा तक नहीं बचाता.
रात अन्देरी गलियों में भटकती रहती है.
और हर रोज सुबह अपने साथ एक नया सूरज लाती है.
जैसे कि पिछली शाम कुछ हुआ ही नहीं था.....
एक रोज ऐसे ही, 
किसी रिश्ते के सूरज को बुझाया मैंने...
लौ तो बुझ गई.. पर आग अभी तक बाकी है...
धुंआ धीरे-२ रिश्ता रहता है.... आग सुलगती रहती है...
मैं रात की तरह इस रिश्ते की अँधेरी गलियों में भटकता रहता हूँ.
कमबख्त न ये रिश्ता बुझता  है, न सुबह आती है!

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रिश्तों के सूरज बुझाना आसान नहीं है ..कहीं न कहीं चिंगारी दबी रह जाती है

अनामिका की सदायें ...... said...

dua karenge ki bhatkati raat jaise agle din naya sooraj le aati hai aise hi koi raat apke liye bhi naya sooraj le aaye.

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब .....
शुभकामनायें !