सूरज निकलता है और शाम में ढलता है, ऋतुएं बदलती है और काल-चक्र चलता है. बस तुम नहीं हो..... अब मैं बिन कहे माँ के दिल की हर बात जान लेता हूँ... उसके हर कहे-अनकहे बातों को बेहिचक मान लेता हूँ... मैं यह सोच खुश हूँ, माँ बहुत खुश होगी.. पर माँ को लगता है मैं चुप हूँ और मेरी ख़ामोशी बहुत बोलती है.. सुनती ख़ामोशी की सदाओं को मेरी और हर पल उन्हें तोलती है कहती है, तू बहुत बदल गया है, तन्हाई के सांचे में ढल गया है, एक अजीब सा ठहराव सा आने लगा है तेरी गति में.. तू आदमी नहीं मशीन हो गया है, नूतन नवीन जीवन में प्राचीन हो गया है. अब मैं माँ को बावला सा नज़र आने लगा हूँ, और माँ मुझे बावली सी... उसे नज़र आती हैं तुम्हारी स्याह यादें, प्रत्यक्ष, परोक्ष एवं उतावली सी.. तुम्हे गए ज्यादा वक़्त तो नहीं हुआ, तुम नहीं हो.. फिर भी किसी निराशा ने तो मुझे नहीं छुआ... मैं मुस्कुराता हूँ, ये बातें, माँ को समझाता हूँ, कहता हूँ माँ देख.. सब कुछ तो यथोचित ही तो चल रहा है, कल भी यूँ ही जलता था ये सूरज आज भी तो जल रहा है.. कहती है वो, सब कुछ त...
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार