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संदेश

बूढ़ा बस स्टैंड

लड़ाई हुई थी अपनी आँखों की , पहली मुलाक़ात पर , वह बूढ़ा सा बस स्टैंड , मुस्कुराया था देख हमें , जाने कितनी बार मिले थे हम वहाँ , जाने कितने मिले होंगे वहाँ हम जैसे , वह शब्दों की पहली जिरह , या अपने लबों की पहली लड़ाई , सब देखा था उसने , सब सुना था , चुपचाप , खामोशी से , बोला कुछ नहीं। कहा नहीं किसी से , कभी नहीं। कितनी बार तुम्हारे इंतज़ार में , बैठा घंटों , जब तुमने आते-2 देर कर दी। जब कभी नाराज़ हो मुझे छोड़ चली गयी तुम , कई पहर , उंगली थामे उसकी , गोद में बैठा रहा उसके। उसके कंधे पर सर रख के। याद है वहीं कहीं गुमा दिया था तुमने दिल मेरा , हंसा था मेरी बेबसी पर वह , अब वह बूढ़ा स्टैंड वहाँ नहीं रहता , कोई fly over गुजरता है वहाँ से देखा था, जब आया था तुम्हारे शहर पिछली बार। कहीं चला गया होगा वह जगह छोड़ , उस बदलाव के उस दौर में , जब सब बदले थे , मैं , तुम और हमारी दुनियाँ ! अब जो सलामत है वह बस यादें हैं , और कुछ मुट्ठी गुजरा हुआ कल , याद आता है वह दिन, जब तुम्हारा दिल रखने को तुम्हारे नए जूतों की त...

काला दिल

सुबह सबेरे चिपका होता है आसमां से यूं , ज्यो सोते वक़्त , माथे की वह बड़ी सी लाल बिंदी , आईने से चिपका देती थी , दादी माँ , बढ़ता , घटता , बढ़ता है , मिटता है और आ जाता है , रंग बदलता रहता है , सुबह , दोपहर , शाम , क्यो ? जलता-2 रहता है , पर जलता है क्यो तू ? आसमां में मीलों दूर बैठा , जलन किस बात की है तुझे ? गुबार किस बात का है तेरे दिल में ? क्या धरती ने दिल तोड़ा था तेरा ? या हमसे जलता है तू ? धनक तेरी देख , सोचता हूँ मैं , हर वक़्त जलते रहने वाले सूरज , दिल तेरा कितना काला होगा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

दो रुपये की खुशी

बड़-बड़ ...... बड़-बड़ाता है , आसमां में देख मुसकुराता है , इशारे करते रहता है , अक्सर चलते देखा है , चलता ही रहता है , और चलते-2 खुद से बतियाता है..... ऐसा ही है वह..... कोशिश नहीं दिखती कुछ बन जाने की , चाह नहीं कुछ पाने की , फिक्र नहीं है खाने की सुध नहीं नहाने की ऐसा ही है वह.... बढ़ी हुयी दाढ़ी आधी सफ़ेद आधी काली , बदहाल कमीज़ , बिना बटन के , चिथड़ों सा पैंट , एक पैर मे काला , एक में सफ़ेद चप्पल बिलकुल दाढ़ी की तरह दो रंगी... ऐसा ही है वह..... बारिश से बचने को , जब छाता ले निकला था मैं , उस रोज तो पहली बार देखा था उसे... उसके अपने छाते के साथ.... छाता ?? छाते जैसा ही था कुछ , बस कपड़े की जगह रस्सियाँ लिपटी थी 2-3 तारों पर.... ऐसा ही है वह..... पागल है पर समझदार है , जनता है , उसे कब कहाँ होना चाहिए , सुबह नुक्कड़ की चाय की दुकान पर , कोई ना कोई चाय बिस्कुट दे ही देता है , शाम को पिछली गली मे समोसे की दुकान पर , वह जानता है , उसे खाने को जरूर मिलेगा और मिलता भी है..... तो दोपहर में सड़क किनारे ...

दायरे

मेरा एक घर है इस महानगर में , 3 कमरे , रसोई घर और एक बड़ा सा हाल , हर कमरे से जुड़ी एक बालकनी , जहां से सारा शहर दिखता है , चाय की चुस्की लेते हुये मैं जब समंदर को देखता हूँ तो यूं लगता है , यह लहरें मेरी ऊंचाई तक आने को मचल रही हैं। बहुत सारे लोगों को जनता हूँ यहाँ और वो सब यह जानते हैं , मेरा घर उनके घर से बड़ा है बहुत बड़ा...... साल के किसी कोने में छुपी हुई छुट्टियाँ चुरा , माँ को ले कर , माँ के घर जाता हूँ शायद अपने पुराने घर। घर बड़ा ही छोटा सा है , बुढ़ापे की लकीरें उसके चेहरे पर साफ-2 नज़र आती हैं , रहता तो वहाँ कोई नहीं है अब , मगर माँ कहती है यादें बसती हैं कुछ वहाँ , जिन्हे सजोने वह हर साल आती है , मेरा अपना एक कमरा भी है जिसमे कोई खिड़की नहीं है कोई , बस एक रोशनदान है। जहां से बाहर कुछ भी नहीं दिखता है , मगर सुबह सबेरे सूरज की किरण मेरे बिस्तर तक आती है। माँ बड़े चाव से बताती है बचपन में मैं इन किरणों को मुट्ठी मे बांध लेता था.... डर के , कहीं मुझे छोड़ ना जाएँ यह..... एक आँगन भी है इस घर में , पास के पीपल के...

‘ब्लैक होल’

यथार्थ .... छलावा .... निराकार ..... कामातुर नायिका सा प्रलोभन , वो गुरुत्वाकर्षण.... नक्षत्र , उल्काओं सा मेरा गलन.... तुम में समाहित होने को उतारू मैं.... तुम्हारा अवशोषण .... पा तुम्हें , तुम में खोना नियति , लुभा कर मिटाना तुम्हारी नियत.. तुम्हे अपना कर , खोना है अस्तित्व अपना   जो बचता है वो तुम हो , सिर्फ तुम.... तुम ' मैं ' नहीं हो पाते हो.... मैं तुम में बस गुम हो के   रह  जाता हूँ... भो स्वप्न! तुम आँखों में पलते निमित मात्र एक सपना हो..... या फिर कोई ‘ ब्लैक होल ’….. प्रकाश की रेखाएँ भी तुम में खो कर रह जाती हैं.....

खामोशी

कई बार ये खामोशी कितनी अच्छी लगती है .....मैं चुप हो जाता और सोचता कि तुम कुछ बोलोगी.... और तुम भी ऐसा ही कुछ सोचने लगती थीं शायद.....  और ये खामोशी पैर पसार लेती थी हमारे बीच.....   अचानक से दोनों ही साथ बोल पड़ते.... ये खामोशी हमारी हंसी मे घुल कर रह जाती.... क्यों ? खाली बैठे बैठे दिमाग मे यही सवाल कौंधा.... क्यों ? फिर हंसी आई .... “उफ कितने सवाल पुछते हो तुम... ? एक और सवाल , फिर देखो तुम्हारा फोन और तुम्हारा सर...... ? ” याद आई तुम्हारी ये बात ..... आज कल खुद से सवाल पुछने से डरता हूँ ..... मन मे ये बात उठती है क्यों ?  ... फिर ज़ोर से हँसता हूँ.... मैं तो मैं ही ठहरा ना.... कमबख्त ये दिल भी कितने सवाल पूछता है मेरा .... ... अब मैं अपने सवालों को छुपा लेता हूँ.... कमरे मे बिखरी खामोशी को खुद पे लपेट लेता हूँ..... ॥       जाने कब से खामोश पड़ा हूँ.... इस बार खामोशी थोड़ी लंबी खिच गयी है...... फोन के दूसरी तरफ बैठा मैं , अब भी इस खामोशी के टूटने का इंतज़ार कर रहा हूँ.... हर वक़्त यही सोचता हूँ ... कभी तो.... कभी तो तुम्हारी आव...

बंटवारा

१६-चिट्ठियां, २२- ग्रीटिंग कार्ड्स, ४८-सूखे गुलाब, ७६-सर्दियों के दिन, १५-रतजगे, १७००-घंटो की फोन पर की गयी बातें, बंटवारे के बाद मेरे हिस्से इतना सब आया, तुमने भी इतना ही कुछ पाया, जितना तुमने, उतना मैंने, गवाया... साथ देखे फिल्मों के पुराने टिकट नज़रे बचा, मैंने तकिये के नीचे छुपाये, मानाने को लिखी थी जो कवितायेँ कभी चोर की तरह तुमने अपनी मुट्ठी में दबाये, तुम्हारी बंद पड़ी घडी, जिसका कांच बस से उतारते वक़्त चटक गया था-मेरे हाँथ, मेरा ख़राब म्प३ प्लयेर, जो अपनी छिना झपटी में टुटा था, तुम्हारे साथ.. दिन तुम्हारे हुए, रातें मेरी ... अपने - अपने रास्ते भी बांटें हमने ... अब जब मैं अपनी रातों को जगाता हूँ, खिड़की से झांकती-२ रात गुजर जाती है.. और मैं रात को गुजरते हुए ... खिड़की से देखता रहता हूँ... सोचता रहता हूँ अगर मैं बटवारें में मिली साड़ी चीजें तुम्हे लौटा दूं, तो.... मेरी नींदें जो तुम्हारे हिस्से आई थीं  क्या तुम मुझे लौटा दोगी?