उड़ते बादल ने एक चेहरा बुना मासूम , मोहक , मदमस्त कुछ सुना – कुछ अनसुना चेहरे की मुस्कुराहट देख पागल दिल ने एक गीत बुना हवा ने की छेड्खानी तेरी जुल्फों को बिखेरा माथे पर सरक आई एक लट और मेरा देखना एक टक तेरा यूँ हडबडा जाना आँचल का सर-सराना सुध बुध का खोना पलकों का बिछोना वो कमसिन सी कली महकी गली-गली कमाल सी लचक माधुर्य ज्यों मिश्री की लड़ी वो यौवन वो जवानी अविरल बहता पानी मुँह फेर लेना बालों को झटक हाय ये अदा जानी पहचानी हवा से बादल का उड़ जाना मध्ध्म होते-होते उस चेहरे का खो जाना सपने की टूटन , आंखो का खुल जाना नींद से जागना और स्वप्न सुंदरी का खो जाना
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार