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जलते हुए सिग्रेट की आवाज़

कभी जलते हुए सिग्रेट की आवाज़ सुनी है तुमने? एक अजीब सी आवाज़, सन्नाटे को भेदती.. मानो उसे मिले हर ज़ख्म का हिसाब मांगती हो... कितनी मिलती है ना उसकी आवाज़ मेरे दिल की आवाज़ से....? सुन अपनापन सा लगता है. वही चीर-परिचित सदायें, वहीँ धुआ-२ सा माहौल.. कभी सुनना इस व्यथा को तुम, मेरे दिल की सदाओं जैसी ही लगेंगीं, आखिर दोनों एक ही तो हैं.. जनता हूँ, सुन कर यहीं सोचोगे कि तुमने कौनसे ज़ख्म दिए हैं मुझे? मैं भी सिग्रेट जला यही सोचता हूँ.. इसके सवाल बेमानी से लगते है... मगर जलन उसका क्या? मेरी और सिग्रेट की फितरत लगभग एक सी हैं.. बस फर्क इतना भर ही है सिग्रेट जलाते जलते बुझ जाती है.. और मैं बुझते-२ जल जाता हूँ... एक जल कर भस्म  हो जाता है और एक...... जितना बुझाओ उतनी ही शिद्दत से जलाता है.... एक बार जरुर जलाना सिग्रेट.. शायद बुझने से पहले ये उन सवालों को पूछ बैठे .. जो मैं जीते-जी, कभी ना पूछ पाऊं... एक कश जरुर लेना... शायद.. सिग्रेट की आत्मा को शान्ति मिले.. बुझने से पहले वो उन होठों  को छू कर गुजरे.. जिनसे अब मेरा नाम ... बमुश्किल ही निकलता हो...

प्रतीक्षा...

घर को सजा दीवारों पर पोस्टर लगा खिड़की खोल , परदे हटा , दरवाजे से सर को सटा , एक टक , सूनी सड़क को देखता हूँ , और देखता रहता हूँ... पसीने से लदफद पथिक बूढ़े बरगद तले बैठता है सुस्ताने , चिड़ियों में नहीं नज़र आती कोई चपलता , सुबह-सबेरे जो लगाती थी चहचहाने ग्रीष्म के तपिस को सहता हूँ , और सहता रहता हूँ... दिल की नदी सूखी पड़ी है , कल्पनाये बंजर हो चली हैं , सूखा है गुल , सूखी कली , खामोश सा मंज़र , सूनी गली , कागज़ पर कुछ लकीरे उकेरता हूँ , और उकेरता रहता हूँ... ना वो शब्द हैं , नहीं वो भाव , नहीं इनमें है कोई सरगोशी, नहीं है वो पहले सा अलाव, ना कुछ करने की इच्छा है , नाही चाव फिर भी तेरे कथन पर कुछ न कुछ करता हूँ , और करता ही रहता हूँ... न मन में कोई अवसाद है और नहीं कोई व्यथा , माथे पर हैं कुछ खुरचने, बयाँ कराती विरह कथा. तेरी आमाग का इन्तेजार करता हूँ और करता ही रहता हूँ.. और करता ही रहता हूँ...