न थकन, न चुभन न शोक, न आह्लाद, बस चिंतन-मनन कर रहा हूँ. न विघटन, न विखंडन, न प्रतिकार,न चित्कार, बस भावनाओं का दमन कर रहा हूँ. न शिशिर,न बसंत, न शीत. न हेमंत, बस नम आँखों से नमन कर रहा हूँ. न संशय, न विस्मय न चिंगारी, न अंगारे बस दिवा-स्वप्नों का दहन कर रहा हूँ. न आग, न धुँआ न कथ, न अकथ बस मन के उन्मादों का हवन कर रहा हूँ.
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार