रिश्तों में आई दूरियों को बालिस्तों से नापने बैठा है वो, अपने गुनाहों को गिन, ढापने बैठा है वो। अपने दायरों से रु-ब-रु होने की ख्वाहिश है उसे, जिन्हें अक्सर वो भूल जाता है, बैठ साँझ को कुरेदता फिरता है और यादों के साये में झूल जाता है। तिनका तिनका जोड़ एक घरौंदा बनता है, फिर उसे तोड़ने लगता है। माले से नोच मोतियों को एक-२ कर बिखेर देता है, उन्हें चुनता और जोड़ने लगता है। पागल है शायद, पागल ही होगा! बीते कल में अगले कल के निशान ढूंढ़ रहा है वो, डर लगता है उजाले से उसे, तो उजाडे में ऑंखें मूंद रहा है वो। अब अपने साये से भी डरने लगा है , अंधेरे का दामन थामे जी रहा है वो। पास आते-२ सब दूर हो जाते हैं उससे, अपने ही आदतों के कड़वे घूँट पी रहा है वो. उसके गुनाहों की फेरहिस्त लम्बी होगी.......... शायद........
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार