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माँ, मैं और तुम!

सूरज निकलता है और शाम में ढलता है, ऋतुएं बदलती है और काल-चक्र चलता है.  बस तुम नहीं हो.....  अब मैं बिन कहे माँ के दिल  की हर बात जान लेता हूँ... उसके हर कहे-अनकहे बातों को  बेहिचक मान लेता हूँ... मैं यह सोच खुश हूँ, माँ बहुत खुश होगी.. पर माँ को लगता है  मैं चुप हूँ और मेरी ख़ामोशी बहुत बोलती है.. सुनती ख़ामोशी की सदाओं  को मेरी और हर पल उन्हें तोलती है कहती है, तू बहुत बदल गया है, तन्हाई के सांचे में ढल गया है, एक अजीब सा ठहराव सा आने  लगा है तेरी गति में.. तू आदमी नहीं मशीन हो गया है, नूतन नवीन जीवन में प्राचीन हो गया है. अब मैं माँ को बावला सा नज़र आने लगा हूँ, और माँ मुझे बावली सी... उसे नज़र आती हैं तुम्हारी स्याह यादें, प्रत्यक्ष, परोक्ष एवं उतावली सी.. तुम्हे गए ज्यादा वक़्त तो नहीं हुआ, तुम नहीं हो.. फिर भी किसी निराशा ने तो मुझे नहीं छुआ... मैं मुस्कुराता हूँ, ये बातें, माँ को समझाता हूँ, कहता हूँ माँ देख.. सब कुछ तो यथोचित ही तो चल रहा है, कल भी यूँ ही जलता था ये सूरज  आज भी तो जल रहा है.. कहती है वो, सब कुछ त...

"मेरी दुनियाँ"

कुछ भी नहीं बदला है वो तब भी वैसी ही थी अब भी वैसी ही है ना बदला है प्यार , नाही दुलार गलती पर उसकी वो झिड़की नाही हमारी वो बेवजह की तकरार जब भी मिलती है बे वजह लड़ता हूँ उसकी प्यारी सी डांट के लिए दिन रात मारता हूँ जब वो रूठ जाती है तब एक सूनापन सा नज़र आता है हर जगह फिर उसे मनाने को ना जाने कितनी मिन्नतें करता हूँ.. जब भी मुस्कुराया हंसी उसके लबों पर छाई चोट मुझे लगी नम उसकी आँखें हो आयीं मायूसी ने मुझे घेरा गम की बदली उसके चेहरे पर छाई/घिर आई एक अजीब सा सहर है उसकी पनाह में मायूसी का साया आने से भी घबराता है हर शिकस्त ने खाया है शिकस्त उस दहलीज पर उदासी की कोई रेखा छु कर गुजरती नहीं वहाँ से आँधी में एक सूखे पत्ते की मानिंद गम भी तेरे साये भर से उड़ जाता है बचपन में हांथ पकड़ सड़क पार कराया करती थी अब भी सड़क पार करते वक्त हांथ पकड़ लेती है पुछो तो कहती है “पहले तुम डर जया करते थे , अब मैं...... गाड़ियों की रफ्तार इतनी तेज़ जो हो गयी है... कुछ भी नहीं बदला माँ तू तब भी वैसी ही थी अब भी वैसी ही है..... जो बदला है वो वक्त है.... बचपन में जब मुझे सुलाते सुलाते तू सो जया...

नीयत और नियति

अब भी देखता हूँ तुझे अपनी नियति से लड़ते हुए। तू तब भी लड़ती थी, बचपन से अब तक............ तुझे लड़ते ही पाया है, हालात से, जज्बात से, कभी ख्यालात से डरती नहीं है तू मुंह मोड़ती नहीं है तू.... हर वीरान सफ़र पर अकेली ही निकलती थी। शायद कोई उम्मीद होगी, लोग आएंगे और कारवां बनेगा! न कोई आया कभी, नाहीं बना कोई कारवां ... फिर भी थकते नहीं देखा तुझे। फिर भी ना रुकी कभी तू अपनी नियति के आगे कभी झुकी नहीं तू.. तेरी ये अनंत यात्रा अनवरत जारी है, जानता हूं तेरी नियत तेरी नियति पे भारी है। कहती थी तू "भाई, मुझे जीतते रहना होगा.. लड़की हूँ ना! एक बार हारी तो हारते रहना होगा.... " सच कहती थी .. बस एक बार हारी थी, फिर हारी थी बार बार! खो सी गई फिर कहीं तू..... माँ के कंधे पर सर रख सोते देखा कई बार, हार के तकिये को भिगोते देखा कई बार। आज बरसों बाद तुझे फिर से लड़ते हुए देखा। वो जीतने का ज़ज्बा वो जिद, उन्हें फिर से तेरी गोद में अंगड़ाई लेते हुए देखा। कुछ ख्वाबों को तेरी आँखों में फिर से पलते हुए देखा, कुछ आधी अधूरी ख्वाहिशों को तेरी पल...