उस झोपड़ी के आगे दिया रोज टिमटिमाता है, सूरज के बुझते ही वो बूढ़ा रोज चिराग जलाता है. अँधेरा घना है सूरज रास्ता भटक जायेगा कहता है और मुस्कुराता है. दिया जला हर मौसम में दिवाकर को अपने घर का पता बताता है. कह कर गयी थी वो उससे की वो चाँद है सूर्य किरणों से ही जलती है रौशनी में ऑंखें चौधियाती हैं इसलिए छिप कर अँधेरे में निकलती है. तबसे किसी ने उसे थकते नहीं देखा कहते हैं उसके घर उम्मीदे बरसती हैं. उजाले की आस में जीता है हर रोज अँधेरे की सांसे उसकी देहरी लांघने को तरसती हैं. उजाले का पुजारी जो ठहरा सूरज से लाली चुरा चाँद को चमकता है गुम न हो जाये अँधेरे में सूरज कहीं इसलिए दिया जला भोर तलक सूरज को रास्ता दिखलाता है. तन से बूढ़ा है, पर मन से जवान, रुकन,थकन जैसे अहसासों से बिलकुल अंजान,. तिमिर नहीं आता कभी उस घर के आस-पास लाखो जुगनू बसते हैं उस घर में बस्ती है वही उजाले की आस...... कहते हैं न जहाँ रौशनी होती है वहां कभी अँधेरा नहीं होता.....
कभी -कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है, क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम न थे... ऐसे ही एक बार मैं तुमको हार आया था.........! .... गुलज़ार