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वक़्त

तुम नहीं थे , मैं खुश रहता था, तुम कहीं नहीं हो सोच दिल बहल जाता था, मैं दुखी  हो जाऊंगा, जब तुम आओगे यह सोच अक्सर दहल जाता था..... ऐसा ही कुछ हुआ भी.... तुम आये  और ....... आखिर क्यों.... तुम्हारे होने का एहसास भर भीतर से गुदगुदा  देता था, दुःख, रंजो-गम, परेशानियों  का वजूद दिल से मिटा देता था... अब तुम्हारे होने का एहसास  तुम्हे खोने के एहसास से दुखदाई क्यों है? तुम नहीं होके भी होते थे... अब तुम  हो के भी नहीं हो, फिर अँधेरे में भी  ये परछाई क्यों है.... अब ऐसा क्या बदल गया, रिश्ते का सूरज साँझ में क्यों ढल गया... तुम वही हो, मै भी वैसा ही हूँ  बस जज्बात पराये हैं,  वक़्त ये कैसी चाल चल गया, दिल बुझ  गया, अब रातें सुनी हैं, फिर तुम्हारे आते ही मैं क्यों जल गया? तुम नहीं होते हो तो  करवटें लेता है वक़्त मेरी ज़िन्दगी में.. तुम आते हो, और तुम्हारे हो कर भी न होने का  सबब पूछते हैं ये गलियां ये मंज़र,  मेरी इस ज़िन्दगी में... मैं चुपचाप भाग लेता हूँ,  खिडकियों को ढांप देता हूँ,  आईने स...

माँ, मैं और तुम!

सूरज निकलता है और शाम में ढलता है, ऋतुएं बदलती है और काल-चक्र चलता है.  बस तुम नहीं हो.....  अब मैं बिन कहे माँ के दिल  की हर बात जान लेता हूँ... उसके हर कहे-अनकहे बातों को  बेहिचक मान लेता हूँ... मैं यह सोच खुश हूँ, माँ बहुत खुश होगी.. पर माँ को लगता है  मैं चुप हूँ और मेरी ख़ामोशी बहुत बोलती है.. सुनती ख़ामोशी की सदाओं  को मेरी और हर पल उन्हें तोलती है कहती है, तू बहुत बदल गया है, तन्हाई के सांचे में ढल गया है, एक अजीब सा ठहराव सा आने  लगा है तेरी गति में.. तू आदमी नहीं मशीन हो गया है, नूतन नवीन जीवन में प्राचीन हो गया है. अब मैं माँ को बावला सा नज़र आने लगा हूँ, और माँ मुझे बावली सी... उसे नज़र आती हैं तुम्हारी स्याह यादें, प्रत्यक्ष, परोक्ष एवं उतावली सी.. तुम्हे गए ज्यादा वक़्त तो नहीं हुआ, तुम नहीं हो.. फिर भी किसी निराशा ने तो मुझे नहीं छुआ... मैं मुस्कुराता हूँ, ये बातें, माँ को समझाता हूँ, कहता हूँ माँ देख.. सब कुछ तो यथोचित ही तो चल रहा है, कल भी यूँ ही जलता था ये सूरज  आज भी तो जल रहा है.. कहती है वो, सब कुछ त...

रह-गुजर

अल्हड सा बचपन सावन का यौवन, पतझड़ की किलकारी फागुन की पिचकारी  वो नीम, वो झूला, कागज के कप, मिट्टी का चूल्हा एक बरसाती नांव वो सर्दियों में अलाव यौवन का दस्तक, बचपन की विदाई, तेरी पहली अंगड़ाई वो शाम हरजाई. तेरी तिरछी नज़र वो कच्ची उम्र भीड़ में तन्हाई पहले प्यार की परछाई. दिल बेकरार तेरा इंतजार मोहब्बत का इजहार और..तेरा इनकार शूल सी चुभन, मन में दहन बर्ताव अनजाना मेरा रूठना, तेरा मनाना.. स्वप्नों का पल्लवन मुस्कराहट का नमन दिल धीर-अधीर मैं, तुम, और नदी का तीर. जज्बातों की गिरह खयालातों की जिरह मन पे उकेरी इबारत ख्वाबों की ईमारत न अब वो पल हैं नाही पलछिन, न जाने कहाँ हो तुम मैं भी हूँ कहीं गुम... न तू, न मैं क्या जय, क्या पराजय. उन शब्दों की खनक ज्यों विशाल धनक.. काली घटा तेरी छटा, तम् घोर, इत-उत चहुँ ओर.. राह ताकती ऑंखें, तेरी धुंधली छवि, वो मासूम पल, मेरा आज, मेरा कल तेरी रुखी आवाज़ वो रूठे साज रिश्तों की दूरियां तेरी मेरी मजबूरियां बिन तेरे भोर एक ख़ामोशी का शोर, आँखों की गुफ्तगू और तेरी जुस्तजू. तन्हा सा...