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खामोशी



कई बार ये खामोशी कितनी अच्छी लगती है .....मैं चुप हो जाता और सोचता कि तुम कुछ बोलोगी.... और तुम भी ऐसा ही कुछ सोचने लगती थीं शायद.....  और ये खामोशी पैर पसार लेती थी हमारे बीच.....
  अचानक से दोनों ही साथ बोल पड़ते.... ये खामोशी हमारी हंसी मे घुल कर रह जाती....
क्यों? खाली बैठे बैठे दिमाग मे यही सवाल कौंधा.... क्यों? फिर हंसी आई .... “उफ कितने सवाल पुछते हो तुम...? एक और सवाल, फिर देखो तुम्हारा फोन और तुम्हारा सर...... ?” याद आई तुम्हारी ये बात ..... आज कल खुद से सवाल पुछने से डरता हूँ ..... मन मे ये बात उठती है क्यों?  ... फिर ज़ोर से हँसता हूँ.... मैं तो मैं ही ठहरा ना.... कमबख्त ये दिल भी कितने सवाल पूछता है मेरा .... ... अब मैं अपने सवालों को छुपा लेता हूँ.... कमरे मे बिखरी खामोशी को खुद पे लपेट लेता हूँ..... ॥
      जाने कब से खामोश पड़ा हूँ.... इस बार खामोशी थोड़ी लंबी खिच गयी है...... फोन के दूसरी तरफ बैठा मैं, अब भी इस खामोशी के टूटने का इंतज़ार कर रहा हूँ.... हर वक़्त यही सोचता हूँ ... कभी तो.... कभी तो तुम्हारी आवाज़ इस खामोशी को तोड़ेगी... या कभी थक के मैं बोल पड़ूँगा.... या दोनों ही एक साथ बोल पड़ेंगे... दोनों साथ हसेंगे.... तुम्हारी हंसी मे ये खामोशी गुम हो के रह जाएगी....
कभी तो होगा.... ऐसा ही कुछ....... 

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