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संदेश

बंटवारा

१६-चिट्ठियां, २२- ग्रीटिंग कार्ड्स, ४८-सूखे गुलाब, ७६-सर्दियों के दिन, १५-रतजगे, १७००-घंटो की फोन पर की गयी बातें, बंटवारे के बाद मेरे हिस्से इतना सब आया, तुमने भी इतना ही कुछ पाया, जितना तुमने, उतना मैंने, गवाया... साथ देखे फिल्मों के पुराने टिकट नज़रे बचा, मैंने तकिये के नीचे छुपाये, मानाने को लिखी थी जो कवितायेँ कभी चोर की तरह तुमने अपनी मुट्ठी में दबाये, तुम्हारी बंद पड़ी घडी, जिसका कांच बस से उतारते वक़्त चटक गया था-मेरे हाँथ, मेरा ख़राब म्प३ प्लयेर, जो अपनी छिना झपटी में टुटा था, तुम्हारे साथ.. दिन तुम्हारे हुए, रातें मेरी ... अपने - अपने रास्ते भी बांटें हमने ... अब जब मैं अपनी रातों को जगाता हूँ, खिड़की से झांकती-२ रात गुजर जाती है.. और मैं रात को गुजरते हुए ... खिड़की से देखता रहता हूँ... सोचता रहता हूँ अगर मैं बटवारें में मिली साड़ी चीजें तुम्हे लौटा दूं, तो.... मेरी नींदें जो तुम्हारे हिस्से आई थीं  क्या तुम मुझे लौटा दोगी?

ए साँझ.............

भानु गमन की ओर अग्रसर, अस्ताचल पर लालिमा प्रखर, कोलाहल को उतारु खगेन्द्र छू कर लौटे शिखर- काट दिवा निर्वासन अनोखा तुम्हारा प्रपंच, अनोखा प्रलोभन ए साँझ.............  बिखरी साँझ किरण, संध्या आगमन, तिमिर आह्वान,  दिवाकर अवसान, सायों का प्रस्थान, खोलती मेरे यादों की थाती अकिंचन... ए साँझ.... व्याकुल आने को, शशि स्वार्थी रोम रोम पुलकित कर, जाते रश्मिरथी  शून्य का विहंगम- दृश्य अलौकिक मेघों में भरे रंग नैसर्गिक  अनूठी तेरी कुंची, अनूठी ये चित्रकारी.. ए साँझ... पस्त मन के विचित्र विकृत विचार हर्षाते सपने आँखों में निराकार सागर तट पर जब भी सूरज बुझाता हूँ... कल लौट के आने का  दिनकर का मौन प्रचार शत-२ सम्मान , शत-२ नमन ए साँझ....

किस्तों की वो मौत

उफ़ ... कितनी दफा फोन किया...... कुछ फूल भेजे .... कोई कार्ड भेजा.... नाराज़ जो बैठी थीं .... और हर बार तरह, उस बार भी  तुम्हे मानाने की कोशिश में नाकाम हुआ मैं... तुम्हे मानना मेरे बस बात थी ही कहाँ... जितना मनाओ, तुम उतनी नाराज़.... वैसे नाराज़ तो तुम्हे होना भी चाहिए था... सर्दी जो हो गई थी तुमको, दिसम्बर की उस बारिश में भींग.. माना ही कहाँ था मैं.... खिंच लाया था भीगने को .... घर पहुचने से पहले .. हमारे छींकों की आवाज़ घर पहुंची थी.... दाँत किट-किटाते जब तुम्हे घर छोड़ बहार निकला तो लगा अलविदा कहते ही मेरे अन्दर का कोई हिस्सा मर गया हो... बोला तो तुमने फोन पे लिख भेजा... तुम्हारी मौत तो किस्तों में ही लिखी है मिस्टर... हर रोज ऐसे ही मारूंगी  तुम्हे..... कतरा-२, किस्तों में... हंसा था जोर से किस्तों में मिलने वाली  एक हसीन  मौत को सोच , और फिर कितनी बार कितनी किस्तों में मरा.. मुझे याद ही कहाँ... अब भी याद कर के हँसता हूँ... सालों बाद की अपन...

पहली कविता

कौन था वह जिसने पहली कविता लिखी .... कोई योगी....या कोई वियोगी..... किसने पहला गीत लिखा ? क्या ख्याल आया था उस कवि मन में उस रोज .... जब वह कुछ शब्दों से एक चेहरा उकेर रहा था.... लिखने का ख्याल आया कैसे उस मन में ? कहीं ‘ तुम्हारे ’ बारे में तो नहीं सोच रहा था वह ? या कहीं , किसी रोज , एक छत पर आधी रात गए... तारे गिनते वक़्त ..... तुमने उसका हाथ थामा था... घंटों गुफ्तगू की.... कुछ कहा... कुछ सुना.... आइसक्रीम खाते-2 तुमने अपने चेहरे पर गिर आई स्याह सी ज़ुल्फें हटायी ...... मुस्कुराते हुये उस ‘ पागल ’ ने देखा था तुम्हें.... फिर सुबह होते ही किसी पत्ते ...... किसी पत्थर पर ‘ तुम्हें ’ लिखा होगा..... सोचता हूँ अक्सर मैं.... शायद ऐसे ही कहीं , किसी रोज , दुनिया के किसी कोने में कोई कविता जन्मी होगी ... कोई गीत उपजा होगा... राहुल रंजन  

कल ही की तो बात है !

कल ही की तो बात है.... फूँक मार मोमबत्ती बुझाई केक कटा , गीत गए गए सब ने तालियाँ बजाई... मोमबत्ती का धुआँ बुझा भी नहीं , कि एक और जा जुड़ी केक से , फिर एक और बढ़ी..... और... फिर और..... अब गिनती नहीं करता बस फूँक मार बुझा देता हूँ.... कल ही की तो बात है , जब पिछली शाम दोस्तों ने पार्टी दी थी .... और मैंने केक काटा था... कल फिर वही दिन है ... फिर मोमबत्तियाँ बुझेंगी... कल ही की तो बात है जैसे... जब माँ ने मेरे चेहरे पे उग आए बालों को देख कहा ... बेटा बड़ा हो गया... और शरमा के आईने से नज़रें हटाई थी मैंने ... आज सामना हुआ आईने से , लगा शक्ल बदल सी गयी है कुछ , काले बालों मे एक सफ़ेद चोर छुपा बैठा मिला... दाढ़ी कल ही तो आनी शुरू हुई थी सफेदी की मिलावट वहाँ भी चालू है... कल ही की तो बात है जब माँ ने मेरी उंगली थामे कहा था बेटा वक़्त के पाँव नहीं होते पर वो गुजर जाता है..... राहुल रंजन 31 जनवरी 2012

एक शख्स ....

यह  शख्स   मुझे, मेरे घर के उस गौरैये कि याद दिलाता है, आंधी ने जिसके घोसले को तोडा था... उसके पलते अरमानों के अण्डों को फोड़ा था.... निरीह,असहाय सी, आशियाने को तिनकों में बिखरती देखती रही... पर अगले ही दिन, उन्ही तिनकों से.. वही, उसी जगह, अपना नया घरोंदा जोड़ा था.... आदमी जैसा दीखता है .. कुछ तेरे जैसा, कुछ मेरे जैसा... पर हम सब से है अलग.... थकता है.. पर रुकता नहीं है... अक्सर नियति से हरता है... मगर किस्मत के आगे झुकता नहीं है.... जाने किस मिटटी का बना है ये  शख्स    .. ज़िन्दगी के समंदर के सामने साहिल सा सख्त.. नाकाम है.. पर नाकारा नहीं है.. दिन भर भटकता है मगर आवारा नहीं है... थक गया है लेकिन हारा नहीं है.... (अरुण दादा के लिए...)

रिश्ता

हर रोज ये शाम कितनी आसानी से सूरज को बुझा देती है! काम इतनी सफाई से होता है कि सूरज की आग का एक कतरा तक नहीं बचाता. रात अन्देरी गलियों में भटकती रहती है. और हर रोज सुबह अपने साथ एक नया सूरज लाती है. जैसे कि पिछली शाम कुछ हुआ ही नहीं था..... एक रोज ऐसे ही,  किसी रिश्ते के सूरज को बुझाया मैंने... लौ तो बुझ गई.. पर आग अभी तक बाकी है... धुंआ धीरे-२ रिश्ता रहता है.... आग सुलगती रहती है... मैं रात की तरह इस रिश्ते की अँधेरी गलियों में भटकता रहता हूँ. कमबख्त न ये रिश्ता बुझता  है, न सुबह आती है!