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संदेश

पहली कविता

कौन था वह जिसने पहली कविता लिखी .... कोई योगी....या कोई वियोगी..... किसने पहला गीत लिखा ? क्या ख्याल आया था उस कवि मन में उस रोज .... जब वह कुछ शब्दों से एक चेहरा उकेर रहा था.... लिखने का ख्याल आया कैसे उस मन में ? कहीं ‘ तुम्हारे ’ बारे में तो नहीं सोच रहा था वह ? या कहीं , किसी रोज , एक छत पर आधी रात गए... तारे गिनते वक़्त ..... तुमने उसका हाथ थामा था... घंटों गुफ्तगू की.... कुछ कहा... कुछ सुना.... आइसक्रीम खाते-2 तुमने अपने चेहरे पर गिर आई स्याह सी ज़ुल्फें हटायी ...... मुस्कुराते हुये उस ‘ पागल ’ ने देखा था तुम्हें.... फिर सुबह होते ही किसी पत्ते ...... किसी पत्थर पर ‘ तुम्हें ’ लिखा होगा..... सोचता हूँ अक्सर मैं.... शायद ऐसे ही कहीं , किसी रोज , दुनिया के किसी कोने में कोई कविता जन्मी होगी ... कोई गीत उपजा होगा... राहुल रंजन  

कल ही की तो बात है !

कल ही की तो बात है.... फूँक मार मोमबत्ती बुझाई केक कटा , गीत गए गए सब ने तालियाँ बजाई... मोमबत्ती का धुआँ बुझा भी नहीं , कि एक और जा जुड़ी केक से , फिर एक और बढ़ी..... और... फिर और..... अब गिनती नहीं करता बस फूँक मार बुझा देता हूँ.... कल ही की तो बात है , जब पिछली शाम दोस्तों ने पार्टी दी थी .... और मैंने केक काटा था... कल फिर वही दिन है ... फिर मोमबत्तियाँ बुझेंगी... कल ही की तो बात है जैसे... जब माँ ने मेरे चेहरे पे उग आए बालों को देख कहा ... बेटा बड़ा हो गया... और शरमा के आईने से नज़रें हटाई थी मैंने ... आज सामना हुआ आईने से , लगा शक्ल बदल सी गयी है कुछ , काले बालों मे एक सफ़ेद चोर छुपा बैठा मिला... दाढ़ी कल ही तो आनी शुरू हुई थी सफेदी की मिलावट वहाँ भी चालू है... कल ही की तो बात है जब माँ ने मेरी उंगली थामे कहा था बेटा वक़्त के पाँव नहीं होते पर वो गुजर जाता है..... राहुल रंजन 31 जनवरी 2012

एक शख्स ....

यह  शख्स   मुझे, मेरे घर के उस गौरैये कि याद दिलाता है, आंधी ने जिसके घोसले को तोडा था... उसके पलते अरमानों के अण्डों को फोड़ा था.... निरीह,असहाय सी, आशियाने को तिनकों में बिखरती देखती रही... पर अगले ही दिन, उन्ही तिनकों से.. वही, उसी जगह, अपना नया घरोंदा जोड़ा था.... आदमी जैसा दीखता है .. कुछ तेरे जैसा, कुछ मेरे जैसा... पर हम सब से है अलग.... थकता है.. पर रुकता नहीं है... अक्सर नियति से हरता है... मगर किस्मत के आगे झुकता नहीं है.... जाने किस मिटटी का बना है ये  शख्स    .. ज़िन्दगी के समंदर के सामने साहिल सा सख्त.. नाकाम है.. पर नाकारा नहीं है.. दिन भर भटकता है मगर आवारा नहीं है... थक गया है लेकिन हारा नहीं है.... (अरुण दादा के लिए...)

रिश्ता

हर रोज ये शाम कितनी आसानी से सूरज को बुझा देती है! काम इतनी सफाई से होता है कि सूरज की आग का एक कतरा तक नहीं बचाता. रात अन्देरी गलियों में भटकती रहती है. और हर रोज सुबह अपने साथ एक नया सूरज लाती है. जैसे कि पिछली शाम कुछ हुआ ही नहीं था..... एक रोज ऐसे ही,  किसी रिश्ते के सूरज को बुझाया मैंने... लौ तो बुझ गई.. पर आग अभी तक बाकी है... धुंआ धीरे-२ रिश्ता रहता है.... आग सुलगती रहती है... मैं रात की तरह इस रिश्ते की अँधेरी गलियों में भटकता रहता हूँ. कमबख्त न ये रिश्ता बुझता  है, न सुबह आती है!

रावण दहन

भू-२ कर स्वाहा होने लगा रावण.. नेता जी के तीर ने रावण की आहुति दे दी थी... 'वह' परेशां सा रावण दहन का यह दृश देखता रहा.. अब उसे भी किसी नेता को तलाशना होगा, नेता तीर चला उसके अन्दर छुपे रावण का दहन कर देगा.. खुश हुआ एक पल को..  नेता की तलाश शुरू हो गयी... पर हर चेहरे के पीछे उसे कोई ना कोई रावण जरुर दिखा.. क्या करे... भला  कोई रावण खुद का दहन भी करता है क्या?  क्यों कोई खुद को जलाएगा? फिर वो क्यों उतारू है वह अपने अन्दर के रावण को मारने को? राम की तलाश अधूरी रही... सोचते -२ उसने सिगरेट जलाई.. मुस्कुराया ...  सोच खुश था..... कि अब अन्दर का रावण दहन होगा... ना भी हुआ तो  कभी ना कभी तो अन्दर के  रावण का दम घुट ही जायेगा !

गिरवी

कुछ था जो अब नहीं है.. बेतहाशा दौड़ता रहता हूँ उसकी परछाई पकडे.. वक़्त बदला तो नहीं  पर उसकी चाल नई है ... एक-२ कर जाने  कितने पैबंद लगाये.. चादरे बदली, कई राज़ छुपाये.. अब भी बोझिल है ज़मीर, गुनाह जो कई हैं! कुछ पता हूँ तो टीस सी उठती है अब.. दिन सोने नहीं देता. रात से नींद रूठी है.. ना मैं गलत हूँ और ना ही तू .. फिर जाने कौन सही है... वो तेरे थे उन्हें आना ही था.. लौट आये हैं तेरी कलाइयों में..  तू मुस्कुराती है और मैं तुझसे नज़ारे चुराता हूँ.. दूर भटकता हूँ तुझसे अपने  दिवा स्वप्नों की परछाइयों में... हंसी रूठी -२ सी है उस रोज से जब बाज़ार में खुद को बिकाऊ पाया था. मेरे कुछ सपनों की कीमत पर माँ जब तुने, अपने कंगन सुनार के पास गिरवी रखवाया था... 

साहिल और समंदर

साहिल अब भी वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था, जब उतावली सी उस लहर ने साहिल को भिगाया था. साहिल खामोश... लहर पलटी और गुस्से से साहिल को एक और टक्कर मारा.. और खुद ही साहिल के पत्थरों में उलझ कर रह गई.. मानो साहिल की बांहों में बिखर सी गई हो .. "आखिर तुम चाहते क्या हो?"साहिल की बाँहों से सरकती लहर ने पूछा.. प्रत्योतर ख़ामोशी... "जब मैं दूर होती तो तुम पर प्यार सा आता है, पास आती हूँ तो नफरत सी होती है तुमसे.. क्यों खिची चली आती हूँ तुम्हारी ओर मैं... क्यों ? " कुछ कहना चाहता था साहिल, लब खोले भी.. पर हमेशा की तरह उसकी आवाज़ लहरों के शोर में कहीं गुम हो कर रह गई.. ये समंदर की लहरे कभी चुप हो तब तो साहिल की बात सुने.. उदास सी लहर वापस जा रही थी  ...सोचती .. कितना भी भागे ,उसे वापस आना ही था .. साहिल को चूमे बिना भी नहीं रहा जाता उसमे ... साहिल की बाहों मे बिखर .उसे पूर्णता  का एहसास होता है ...   और साथ ही साथ अपनी लघुता का भी... इधर.. साहिल एक तक लहर के वापसी का इंतज़ार करने लगा.. दोनों ही जाने थे, एक दुसरे के बिना वो अधूरे ह...